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नज़्म
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
फिर ख़याल-ए-आरिज़-ए-ताबाँ ने लीं अंगड़ाइयाँ
रात को फिर दिन बनाने का ज़माना आ गया
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
मगर लबों पे नग़्मा-ए-हयात शाद-काम है
रहीन-ए-आरिज़-ए-हसीं असीर-ए-ज़ुल्फ़-ए-मुश्कबू!
मोहसिन भोपाली
नज़्म
विदा-ए-रोज़-ए-रौशन है गजर शाम-ए-ग़रीबाँ का
चरा-गाहों से पलटे क़ाफ़िले वो बे-ज़बानों के
नज़्म तबातबाई
नज़्म
रोज़-ए-रौशन जा चुका, हैं शाम की तय्यारियाँ
उड़ रही हैं आसमाँ पर ज़ाफ़रानी साड़ियाँ
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
गोलकुंडा हुसन-ए-तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का दयार
अज़मत-ए-अफ़साना-ए-हस्ती की ज़िंदा यादगार
ख़ुर्शीद अहमद जामी
नज़्म
पाँव रखते भी नज़ाकत से अगर होंगे कहीं
बे-बदल हुस्न-ए-जहाँ-सोज़ पे नाज़ाँ होंगे