aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "ibtilaa"
इल्म है इंसाँ की तहज़ीब-ओ-तमद्दुन के लिएये नहीं इंसानी क़द्रों के तलव्वुन के लिएइल्म है आपस में इख़्लास-ओ-उख़ुव्वत के लिएये नहीं औरों के नुक़सान-ओ-हलाकत के लिएइल्म है इंसान की बहबूद-ओ-बक़ा के वास्तेये नहीं इंसानियत की इब्तिला के वास्तेइल्म है इंसान की ख़ुद-आगही के वास्तेऔर इंसानों में भाई-चारगी के वास्तेइल्म से रौशन-ख़याली आती है इंसान मेंपुख़्तगी अख़्लाक़ में तो ताज़गी ईमान मेंइल्म बढ़ता है कोई उस को घटा सकता नहींये वो दौलत है जिसे कोई चुरा सकता नहींइल्म को फैलाइए अच्छे मक़ासिद के लिएताकि दुनिया की तरक़्क़ी का निशाना बढ़ सकेइल्म चढ़ता आफ़्ताब और इल्म है बाद-ए-मुरादइल्म ज़िंदाबाद इस की आगही पाइंदा-बाद
हज़रत आदम पे जो गुज़री है सब को याद हैदाना-ए-गंदुम की ज़िंदा आज तक बे-दाद हैआज फिर औलाद-ए-आदम पर वही उफ़्ताद हैइस का बानी भी फ़रिश्तों का वही उस्ताद हैदौर दौरा आज इस का चोर-बाज़ारों में हैमाहेरीन-ए-चोर-बाज़ारी के ग़म-ख़्वारों में हैउन में देखा इस का जल्वा जो ज़ख़ीरा-बाज़ हैंदफ़्न तह-ख़ानों में जिन के बोरियों के राज़ हैंबोरियों से मिलते-जुलते तोंद के अंदाज़ हैंऔर फ़रियाद-ओ-बुका में सब के हम-आवाज़ हैंतोंद पर है हाथ और फ़ाक़ों से हालत ज़ार हैइन को ईंधन इस जहन्नम के लिए दरकार हैहो गया बाज़ार से आटे का ऐसा इंतिक़ालअब खुले बाज़ार में आटे का मिलना है मुहालइक ज़ख़ीरा-बाज़ मौलाना-नुमा दूकान-दारक़ौम के इस इब्तिला से कल बहुत थे बे-क़रारआह इस मिल्लत का क्यूँ गेहूँ पे है दार-ओ-मदारकाश खाती बाजरा या काश ये खाती जवारइस के खाने के लिए नेमत हर इक मौजूद हैदाना-ए-गंदुम भला क्यूँ गौहर-ए-मक़्सूद हैसच जो पूछो तो कहूँ शैतान का राशन है येजिस ने जन्नत लूट ली इंसाँ का वो दुश्मन है येहैफ़ है इंसान कर दे इस पर जन्नत तक निसारसब को गंदुम से बचाना ऐ मिरे पर्वरदिगारसैंकड़ों मन यूँ तो गेहूँ मेरे तह-ख़ाने में हैऔर मज़ा भी क्या मुझे आज़ार पहचाने में हैमेरे हिस्से की वही मय है जो पैमाने में हैहाँ मगर दोज़ख़ जो है गेहूँ के परवाने में हैजिस ने गेहूँ खा लिया दोज़ख़ में गोले खाएगाजिस को जन्नत चाहिए वो सिर्फ़ छोले खाएगा
ख़ाक पर इक बूँद लपकीबूँद जम कर लोथड़ाइस लोथड़े में हड्डियाँफिर हड्डियों पर मास आयामास जिस पर नक़्श उभरेनक़्श को जुम्बिश मिलीऔर ख़ामुशी की कोख ख़ाली हो गईचीख़ पहली गुफ़्तुगू थीथम गई तो इस से फूटा क़हक़हाजब थक के टूटा क़हक़हातब आख़िरी आवाज़ सिसकीजुम्बिशें साकित हुईंऔर क़ब्र की ख़ामोशियों मेंनक़्श पिघले मास उतराहड्डियाँ उर्यां हुईं और मुंहदिमलोथड़ा गल सड़ के फिर से बूँद थाऔर बूँद धरती खा गईहाए मेरे इब्तिला की इंतिहा इब्तिदा तक आ गई
मेरे वतन के ग़यूर बेटोतुम्हारी तक़दीर-ए-बे-गुनाही पे दम-ब-ख़ुद हैं तमाम क़ौमेंज़मीर-ए-इंसाँ तुम्हारे ग़म से किसी तरह बे-ख़बर नहीं हैयक़ीन जानो तुम्हारे अय्याम-ए-इब्तिला ख़त्म हो चुके हैंयक़ीन जानो जहान-ए-ताज़ा में क़हत-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र नहीं है
'मुशीर'-अंकल! ज़माना इश्क़ से बढ़ कर नहीं हैजो कहे जो कुछ करेजो भी दिखाएइश्क़ से बढ़ कर नहीं हैइश्क़ तो ख़ुद इक ज़माना हैये पूरा अहद हैइक दौर हैइस दौर में क्या क्या नहीं होताकभी ये दौर दौर-ए-इब्तिला हैऔर कभी इक सरख़ुशीवारफ़्तगी का अहद-ए-पैहम है
जफ़ा-शिआर सितम-केश हुर्रियत दुश्मनडरा रहा है तू आँखें ये क्या दिखा के मुझेमिरे क़दम को हो जुम्बिश ये ग़ैर-मुमकिन हैपयाम-ए-शौक़ से दे दर्द-ओ-इब्तिला के मुझेकोई मुझे रह-ए-हक़ से हटा नहीं सकताअगर यक़ीन न हो देख ले हटा के मुझेज़बाँ पे कलिमा-ए-हक़ के सिवा जो हर्फ़ आ जाएतो फूँक दे मिरी ग़ैरत अभी जला के मुझेहै आश्ना मिरे काम-ओ-दहन से तल्ख़ी-ए-ग़मये ज़हर देख ले सौ मर्तबा पिला के मुझेहै मेरे वास्ते मेराज-ए-रूह तख़्ता-ए-दारतू ख़ुश अगर है तो हो दार पर चढ़ा के मुझेफ़ना है मेरे लिए मुज़्दा-ए-बक़ा-ए-दवामसुना रहा है तू अहकाम क्या क़ज़ा के मुझेसिवा ख़ुदा के किसी से मैं दब नहीं सकतान रख सकेगा तू हरगिज़ कभी दबा के मुझेतिरे ख़याल में गर हूँ मैं क़ाबिल-ए-तस्ख़ीरतो देख ले ग़म-ओ-आलाम में फँसा के मुझेमिरी तरफ़ से इजाज़त है तुझ को आम उस कीकि दे सके तू ग़म-ओ-रंज इंतिहा के मुझेख़ुशी के साथ हूँ राज़ी हर इब्तिला के लिएतू मुंतख़ब मुझे कर तो सही जफ़ा के लिए
वो ख़ाक बोए थे हालात ने शरर जिस मेंअब उस में फूल तमन्ना के खिलने वाले हैंहुए थे जिन के सबब चाक चाक सीना-ए-दिलवो चाक अब उन्हीं हाथों से सिलने वाले हैंजो दोस्त उलझे थे आपस में दुश्मनों की तरहफिर एक बार वो आपस में मिलने वाले हैंदयारए-रूस हमारा सलाम-ए-जाँ हो क़ुबूलकि राह-ए-शौक़ को आसाँ बना दिया तू नेये दौर आज का तो मोजज़ों का दौर नहींमगर वो मोजज़ा हम को दिखा दिया तू नेकि जिस से दूर ओ क़रीब एक नूर फैल गयाचराग़-ए-कुश्ता को ऐसे जला दिया तू नेये ताशकंद से पैग़ाम-ए-दिल-नवाज़ आयाकि इब्तिला का ज़माना गुज़र गया यारो!बहुत रहा जिसे दावा-ए-साहिल-आशूबीसुना ये है कि वो दरिया उतर गया यारो!कुछ इस तरह से किसी ने दिया लहू अपनाकि अर्ज़-ए-शर्क़ का चेहरा निखर गया यारो!वो ख़ाक जिस पे मिरे रहनुमा ने जाँ दी हैमिरा सलाम उसी दिल-नवाज़ ख़ाक के नामनवा-ए-ख़ामा हो मंसूब आज से प्यारोशहीद-ए-अम्न की रूदाद-ए-ताबनाक के नाममिरे जुनून-ए-वफ़ा का यही पयाम है आजसुख़नवरान-ओ-अदीबान-ए-हिन्द-ओ-पाक के नाम
सुमूम तेज़ है मौज-ए-सबा को आम करोख़िज़ाँ के रुख़ को पलटने का एहतिमाम करोबिखर रहे हो मज़ामीन-ए-शायरी की तरहकिसी मक़ाम पे जम जाओ कोई काम करोसबक़ मिला है ये तारीख़ के नविश्तों सेकि तेग़-ए-हैदर-ए-कर्रार बे-नियाम करोजबीं पे ख़ाक है किस आस्तान-ए-दौलत कीकभी तो अपनी आना का भी एहतिराम करोये मशवरे हैं कई दिन से क़स्र-ए-शाही मेंकिसी तरीक़ से दानिशवरों को राम करोक़लम की शोख़-निगारी को रोकने के लिएज़बाँ-दराज़ अदीबों को ज़ेर-ए-दाम करोझुका के सर किसी फ़रमाँ-रवा की चौखट परज़बान-ए-तोहमत-ओ-इल्ज़ाम बे-लगाम करो'ज़फ़र' अली की ज़बाँ में है मशवरा मेरामिरी तरफ़ से इसे दोस्तों में आम करोइस इब्तिला से ख़ुदा की हज़ार-बार पनाहकि झुक के तुम किसी ना-अहल को सलाम करो
मैं इब्तिदा-ए-इश्क़ से बे-मेहर ही रहातुम इंतिहा-ए-इश्क़ का मेआ'र ही रहोतुम ख़ून थूकती हो ये सुन कर ख़ुशी हुईइस रंग इस अदा में भी पुरकार ही रहो
जंग वहशत से बरबरिय्यत सेअम्न तहज़ीब-ओ-इर्तिक़ा के लिएजंग मर्ग-आफ़रीं सियासत सेअम्न इंसान की बक़ा के लिए
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
ये काएनात-ए-अज़ीमलगता हैअपनी अज़्मत सेआज भी मुतइन नहीं हैकि लम्हा लम्हावसीअ-तर और वसीअ-तर होती जा रही हैये अपनी बाँहें पसारती हैये कहकशाओं की उँगलियों सेनए ख़लाओं को छू रही हैअगर ये सच हैतो हर तसव्वुर की हद से बाहरमगर कहीं परयक़ीनन ऐसा कोई ख़ला हैकि जिस कोइन कहकशाओं की उँगलियों नेअब तक छुआ नहीं हैख़लाजहाँ कुछ हुआ नहीं हैख़लाकि जिस ने किसी से भी ''कुन'' सुना नहीं हैजहाँ अभी तक ख़ुदा नहीं हैवहाँकोई वक़्त भी न होगाये काएनात-ए-अज़ीमइक दिनछुएगीइस अन-छुए ख़ला कोऔर अपने सारे वजूद सेजब पुकारेगी''कुन''तो वक़्त को भी जनम मिलेगाअगर जनम है तो मौत भी हैमैं सोचता हूँये सच नहीं हैकि वक़्त की कोई इब्तिदा है न इंतिहा हैये डोर लम्बी बहुत हैलेकिनकहीं तो इस डोर का सिरा हैअभी ये इंसाँ उलझ रहा हैकि वक़्त के इस क़फ़स मेंपैदा हुआयहीं वो पला-बढ़ा हैमगर उसे इल्म हो गया हैकि वक़्त के इस क़फ़स से बाहर भी इक फ़ज़ा हैतो सोचता हैवो पूछता हैये वक़्त क्या है
यही फ़ज़ा थी यही रुत यही ज़माना थायहीं से हम ने मोहब्बत की इब्तिदा की थी
बंदा-ए-मज़दूर को जा कर मिरा पैग़ाम देख़िज़्र का पैग़ाम क्या है ये पयाम-ए-काएनातऐ कि तुझ को खा गया सर्माया-दार-ए-हीला-गरशाख़-ए-आहू पर रही सदियों तलक तेरी बरातदस्त-ए-दौलत-आफ़रींं को मुज़्द यूँ मिलती रहीअहल-ए-सर्वत जैसे देते हैं ग़रीबों को ज़कातसाहिर-अल-मूत ने तुझ को दिया बर्ग-ए-हशीशऔर तू ऐ बे-ख़बर समझा उसे शाख़-ए-नबातनस्ल क़ौमीयत कलीसा सल्तनत तहज़ीब रंगख़्वाजगी ने ख़ूब चुन चुन के बनाए मुस्किरातकट मरा नादाँ ख़याली देवताओं के लिएसुक्र की लज़्ज़त में तू लुटवा गया नक़्द-ए-हयातमक्र की चालों से बाज़ी ले गया सरमाया-दारइंतिहा-ए-सादगी से खा गया मज़दूर मातउठ कि अब बज़्म-ए-जहाँ का और ही अंदाज़ हैमश्रिक-ओ-मग़रिब में तेरे दौर का आग़ाज़ हैहिम्मत-ए-आली तो दरिया भी नहीं करती क़ुबूलग़ुंचा साँ ग़ाफ़िल तिरे दामन में शबनम कब तलकनग़्मा-ए-बेदारी-ए-जमहूर है सामान-ए-'ऐशक़िस्सा-ए-ख़्वाब-आवर अस्कंदर-ओ-जम कब तलकआफ़्ताब-ए-ताज़ा पैदा बत्न-ए-गीती से हुआआसमान डूबे हुए तारों का मातम कब तलकतोड़ डालीं फ़ितरत-ए-इंसाँ ने ज़ंजीरें तमामदूरी-ए-जन्नत से रोती चश्म-ए-आदम कब तलकबाग़्बान-ए-चारा-फ़र्मा से ये कहती है बहारज़ख़्म-ए-गुल के वास्ते तदबीर-ए-मरहम कब तलककिर्मक-ए-नादाँ तवाफ़-ए-शम्अ से आज़ाद होअपनी फ़ितरत के तजल्ली-ज़ार में आबाद होदुनिया-ए-इस्लाम
क़ल्ब ओ नज़र की ज़िंदगी दश्त में सुब्ह का समाँचश्मा-ए-आफ़्ताब से नूर की नद्दियाँ रवाँ!हुस्न-ए-अज़ल की है नुमूद चाक है पर्दा-ए-वजूददिल के लिए हज़ार सूद एक निगाह का ज़ियाँ!सुर्ख़ ओ कबूद बदलियाँ छोड़ गया सहाब-ए-शब!कोह-ए-इज़म को दे गया रंग-ब-रंग तैलिसाँ!गर्द से पाक है हवा बर्ग-ए-नख़ील धुल गएरेग-ए-नवाह-ए-काज़िमा नर्म है मिस्ल-ए-पर्नियाँआग बुझी हुई इधर, टूटी हुई तनाब उधरक्या ख़बर इस मक़ाम से गुज़रे हैं कितने कारवाँआई सदा-ए-जिब्रईल तेरा मक़ाम है यहीएहल-ए-फ़िराक़ के लिए ऐश-ए-दवाम है यहीकिस से कहूँ कि ज़हर है मेरे लिए मय-ए-हयातकोहना है बज़्म-ए-कायनात ताज़ा हैं मेरे वारदात!क्या नहीं और ग़ज़नवी कारगह-ए-हयात मेंबैठे हैं कब से मुंतज़िर अहल-ए-हरम के सोमनात!ज़िक्र-ए-अरब के सोज़ में, फ़िक्र-ए-अजम के साज़ मेंने अरबी मुशाहिदात, ने अजमी तख़य्युलातक़ाफ़िला-ए-हिजाज़ में एक हुसैन भी नहींगरचे है ताब-दार अभी गेसू-ए-दजला-ओ-फ़ुरात!अक़्ल ओ दिल ओ निगाह का मुर्शिद-ए-अव्वलीं है इश्क़इश्क़ न हो तो शर-ओ-दीं बुतकद-ए-तसव्वुरात!सिदक़-ए-ख़लील भी है इश्क़ सब्र-ए-हुसैन भी है इश्क़!म'अरका-ए-वजूद में बद्र ओ हुनैन भी है इश्क़!अाया-ए-कायनात का म'अनी-ए-देर-याब तू!निकले तिरी तलाश में क़ाफ़िला-हा-ए-रंग-ओ-बू!जलवतियान-ए-मदरसा कोर-निगाह ओ मुर्दा-ज़ाैक़जलवतियान-ए-मयकदा कम-तलब ओ तही-कदू!मैं कि मिरी ग़ज़ल में है आतिश-ए-रफ़्ता का सुराग़मेरी तमाम सरगुज़िश्त खोए हुओं की जुस्तुजू!बाद-ए-सबा की मौज से नश-नुमा-ए-ख़ार-अो-ख़स!मेरे नफ़स की मौज से नश-ओ-नुमा-ए-आरज़ू!ख़ून-ए-दिल ओ जिगर से है मेरी नवा की परवरिशहै रग-ए-साज़ में रवाँ साहिब-ए-साज़ का लहू!फुर्सत-ए-कशमुकश में ईं दिल बे-क़रार रायक दो शिकन ज़्यादा कुन गेसू-ए-ताबदार रालौह भी तू, क़लम भी तू, तेरा वजूद अल-किताब!गुम्बद-ए-आबगीना-रंग तेरे मुहीत में हबाब!आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक में तेरे ज़ुहूर से फ़रोग़ज़र्रा-ए-रेग को दिया तू ने तुलू-ए-आफ़्ताब!शौकत-ए-संजर-ओ-सलीम तेरे जलाल की नुमूद!फ़क़्र-ए-'जुनेद'-ओ-'बायज़ीद' तेरा जमाल बे-नक़ाब!शौक़ तिरा अगर न हो मेरी नमाज़ का इमाममेरा क़याम भी हिजाब! मेरा सुजूद भी हिजाब!तेरी निगाह-ए-नाज़ से दोनों मुराद पा गएअक़्ल, ग़याब ओ जुस्तुजू! इश्क़, हुज़ूर ओ इज़्तिराब!तीरा-ओ-तार है जहाँ गर्दिश-ए-आफ़ताब से!तब-ए-ज़माना ताज़ा कर जल्वा-ए-बे-हिजाब से!तेरी नज़र में हैं तमाम मेरे गुज़िश्ता रोज़ ओ शबमुझ को ख़बर न थी कि है इल्म-ए-नख़ील बे-रुतब!ताज़ा मिरे ज़मीर में म'अर्क-ए-कुहन हुआ!इश्क़ तमाम मुस्तफ़ा! अक़्ल तमाम बू-लहब!गाह ब-हीला मी-बरद, गाह ब-ज़ोर मी-कशदइश्क़ की इब्तिदा अजब इश्क़ की इंतिहा अजब!आलम-ए-सोज़-ओ-साज़ में वस्ल से बढ़ के है फ़िराक़वस्ल में मर्ग-ए-आरज़ू! हिज्र में ल़ज़्जत-ए-तलब!एेन-ए-विसाल में मुझे हौसला-ए-नज़र न थागरचे बहाना-जू रही मेरी निगाह-ए-बे-अदब!गर्मी-ए-आरज़ू फ़िराक़! शोरिश-ए-हाव-ओ-हू फ़िराक़!मौज की जुस्तुजू फ़िराक़! क़तरे की आबरू फ़िराक़!
साक़ी की हर निगाह पे बल खा के पी गयालहरों से खेलता हुआ लहरा के पी गयाबे-कैफ़ियों के कैफ़ से घबरा के पी गयातौबा को तोड़-ताड़ के थर्रा के पी गयाज़ाहिद! ये तेरी शोख़ी-ए-रिन्दाना देखनारहमत को बातों बातों में बहला के पी गयासर-मस्ती-ए-अज़ल मुझे जब याद आ गईदुनिया-ए-ए'तिबार को ठुकरा के पी गयाआज़ुर्दगी-ए-ख़ातिर-ए-साक़ी को देख करमुझ को ये शर्म आई कि शर्मा के पी गयाऐ रहमत-ए-तमाम मिरी हर ख़ता मुआफ़मैं इंतिहा-ए-शौक़ में घबरा के पी गयापीता बग़ैर इज़्न ये कब थी मिरी मजालदर-पर्दा चश्म-ए-यार की शह पा के पी गयाउस जान-ए-मय-कदा की क़सम बारहा 'जिगर'कुल आलम-ए-बसीत पे मैं छा के पी गया
फ़रिश्ते पढ़ते हैं जिस को वो नाम है तेराबड़ी जनाब तिरी फ़ैज़ आम है तेरासितारे इश्क़ के तेरी कशिश से हैं क़ाएमनिज़ाम-ए-मेहर की सूरत निज़ाम है तेरातिरी लहद की ज़ियारत है ज़िंदगी दिल कीमसीह ओ ख़िज़्र से ऊँचा मक़ाम है तेरानिहाँ है तेरी मोहब्बत में रंग-ए-महबूबीबड़ी है शान बड़ा एहतिराम है तेराअगर सियाह दिलम दाग़-ए-लाला-ज़ार-ए-तवामदिगर कुशादा जबीनम गुल-ए-बहार-ए-तवामचमन को छोड़ के निकला हूँ मिस्ल-ए-निकहत-ए-गुलहुआ है सब्र का मंज़ूर इम्तिहाँ मुझ कोचली है ले के वतन के निगार-ख़ाने सेशराब-ए-इल्म की लज़्ज़त कशाँ कशाँ मुझ कोनज़र है अब्र-ए-करम पर दरख़्त-ए-सहरा हूँकिया ख़ुदा ने न मोहताज-ए-बाग़बाँ मुझ कोफ़लक-नशीं सिफ़त-ए-मेहर हूँ ज़माने मेंतिरी दुआ से अता हो वो नर्दबाँ मुझ कोमक़ाम हम-सफ़रों से हो इस क़दर आगेकि समझे मंज़िल-ए-मक़्सूद कारवाँ मुझ कोमिरी ज़बान-ए-क़लम से किसी का दिल न दुखेकिसी से शिकवा न हो ज़ेर-ए-आसमाँ मुझ कोदिलों को चाक करे मिस्ल-ए-शाना जिस का असरतिरी जनाब से ऐसी मिले फ़ुग़ाँ मुझ कोबनाया था जिसे चुन चुन के ख़ार ओ ख़स मैं नेचमन में फिर नज़र आए वो आशियाँ मुझ कोफिर आ रखूँ क़दम-ए-मादर-ओ-पिदर पे जबींकिया जिन्हों ने मोहब्बत का राज़-दाँ मुझ कोवो शम-ए-बारगह-ए-ख़ानदान-ए-मुर्तज़वीरहेगा मिस्ल-ए-हरम जिस का आस्ताँ मुझ कोनफ़स से जिस के खिली मेरी आरज़ू की कलीबनाया जिस की मुरव्वत ने नुक्ता-दाँ मुझ कोदुआ ये कर कि ख़ुदावंद-ए-आसमान-ओ-ज़मींकरे फिर उस की ज़ियारत से शादमाँ मुझ कोवो मेरा यूसुफ़-ए-सानी वो शम-ए-महफ़िल-ए-इश्क़हुई है जिस की उख़ुव्वत क़रार-ए-जाँ मुझ कोजला के जिस की मोहब्बत ने दफ़्तर-ए-मन-ओ-तूहवा-ए-ऐश में पाला किया जवाँ मुझ कोरियाज़-ए-दहर में मानिंद-ए-गुल रहे ख़ंदाँकि है अज़ीज़-तर अज़-जाँ वो जान-ए-जाँ मुझ कोशगुफ़्ता हो के कली दिल की फूल हो जाएये इल्तिजा-ए-मुसाफ़िर क़ुबूल हो जाए
तुम रूठ चुके दिल टूट चुका अब याद न आओ रहने दोइस महफ़िल-ए-ग़म में आने की ज़हमत न उठाओ रहने दोये सच कि सुहाने माज़ी के लम्हों को भुलाना खेल नहींये सच कि भड़कते शोलों से दामन को बचाना खेल नहींरिसते हुए दिल के ज़ख़्मों को दुनिया से छुपाना खेल नहींऔराक़-ए-नज़र से जल्वों की तहरीर मिटाना खेल नहींलेकिन ये मोहब्बत के नग़्मे इस वक़्त न गाओ रहने दोजो आग दबी है सीने में होंटों पे न लाओ रहने दोजारी हैं वतन की राहों में हर सम्त लहू के फ़व्वारेदुख-दर्द की चोटें खा खा कर लर्ज़ां हैं दिलों के गहवारेअंगुश्त ब-लब हैं शम्स ओ क़मर हैरान ओ परेशाँ हैं तारेहैं बाद-ए-सहर के झोंके भी तूफ़ान-ए-मुसलसल के धारेअब फ़ुर्सत-ए-नाव-नोश कहाँ अब याद न आओ रहने दोतूफ़ान में रहने वालों को ग़ाफ़िल न बनाओ रहने दोमाना कि मोहब्बत की ख़ातिर हम तुम ने क़सम भी खाई थीये अम्न-ओ-सुकूँ से दूर फ़ज़ा पैग़ाम-ए-सुकूँ भी लाई थीवो दौर भी था जब दुनिया की हर शय पे जवानी छाई थीख़्वाबों की नशीली बद-मस्ती मासूम दिलों पर छाई थीलेकिन वो ज़माना दूर गया अब याद न आओ रहने दोजिस राह पे जाना लाज़िम है उस से न हटाओ रहने दोअब वक़्त नहीं उन नग़्मों का जो ख़्वाबों को बेदार करेंअब वक़्त है ऐसे नारों का जो सोतों को होश्यार करेंदुनिया को ज़रूरत है उन की जो तलवारों को प्यार करेंजो क़ौम ओ वतन के क़दमों पर क़ुर्बानी दें ईसार करेंरूदाद-ए-मोहब्बत फिर कहना अब मान भी जाओ रहने दोजादू न जगाओ रहने दो फ़ित्ने न उठाओ रहने दोमैं ज़हर-ए-हक़ीक़त की तल्ख़ी ख़्वाबों में छुपाऊँगा कब तकग़ुर्बत के दहकते शोलों से दामन को बचाऊँगा कब तकआशोब-ए-जहाँ की देवी से यूँ आँख चुराऊँगा कब तकजिस फ़र्ज़ को पूरा करना है वो फ़र्ज़ भुलाऊँगा कब तकअब ताब नहीं नज़्ज़ारे की जल्वे न दिखाओ रहने दोख़ुर्शीद-ए-मोहब्बत के रुख़ से पर्दे न उठाओ रहने दोमुमकिन है ज़माना रुख़ बदले ये दौर-ए-हलाकत मिट जाएये ज़ुल्म की दुनिया करवट ले ये अहद-ए-ज़लालत मिट जाएदौलत के फ़रेबी बंदों का ये किब्र और नख़वत मिट जाएबर्बाद वतन के महलों से ग़ैरों की हुकूमत मिट जाएउस वक़्त ब-नाम-ए-अहद-ए-वफ़ा मैं ख़ुद भी तुम्हें याद आऊँगामुँह मोड़ के सारी दुनिया से उल्फ़त का सबक़ दुहराऊँगा
यही जगह थी यही दिन था और यही लम्हातसरों पे छाई थी सदियों से इक जो काली रातइसी जगह इसी दिन तो मिली थी उस को मातइसी जगह इसी दिन तो हुआ था ये एलानअँधेरे हार गए ज़िंदाबाद हिन्दोस्तानयहीं तो हम ने कहा था ये कर दिखाना हैजो ज़ख़्म तन पे है भारत के उस को भरना हैजो दाग़ माथे पे भारत के है मिटाना हैयहीं तो खाई थी हम सब ने ये क़सम उस दिनयहीं से निकले थे अपने सफ़र पे हम उस दिनयहीं था गूँज उठा वन्दे-मातरम उस दिनहै जुरअतों का सफ़र वक़्त की है राहगुज़रनज़र के सामने है साठ मील का पत्थरकोई जो पूछे किया क्या है कुछ किया है अगरतो उस से कह दो कि वो आए देख ले आ करलगाया हम ने था जम्हूरियत का जो पौधावो आज एक घनेरा सा ऊँचा बरगद हैऔर उस के साए में क्या बदला कितना बदला हैकब इंतिहा है कोई इस की कब कोई हद है
जहाँ-ज़ादएक तू और एक वो और एक मैंये तीन ज़ाविए किसी मुसल्लस-ए-क़दीम केहमेशा घूमते रहेकि जैसे मेरा चाक घूमता रहामगर न अपने-आप का कोई सुराग़ पा सकेमुसल्लस-ए-क़दीम को मैं तोड दूँ, जो तू कहे, मगर नहींजो सेहर मुझ पे चाक का वही है इस मुसल्लस-ए-क़दीम कानिगाहें मेरे चाक की जो मुझ को देखती हैंघूमते हुएसुबू-ओ-जाम पर तिरा बदन तिरा ही रंग तेरी नाज़ुकीबरस पड़ीवो कीमिया-गरी तिरे जमाल की बरस पड़ीमैं सैल-ए-नूर-ए-अंदरूँ से धुल गया!मिरे दरों की ख़ल्क़ यूँ गली गली निकल पड़ीकि जैसे सुब्ह की अज़ाँ सुनाई दी!तमाम कूज़े बनते बनते 'तू' ही बन के रह गएनशात इस विसाल-ए-रह-गुज़र की ना-गहाँ मुझे निगल गईयही प्याला-ओ-सुराही-ओ-सुबू का मरहला है वोकि जब खमीर-ए-आब-ओ-गिल से वो जुदा हुएतो उन को सम्त-ए-राह-ए-नौ की कामरानियाँ मिलेंमैं इक ग़रीब कूज़ा-गरये इंतिहा-ऐ-मारिफतये हर प्याला-ओ-सुराही-ओ-सुबू की इंतिहा-ए-मारिफतमुझे हो इस की क्या ख़बर?
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