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नज़्म
मिरी नवाओं से लर्ज़ां हैं तार-ए-ऊद-ए-हयात
मैं ज़िंदगी का हुदी-ख़्वाँ नहीं तो कुछ भी नहीं
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
लो ईद आई लो दो पुलिए मैदान में भर बाज़ार लगा
हर चाहत का सामान हुआ हर ने'मत का अम्बार लगा