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नज़्म
है कभी जाँ और कभी तस्लीम-ए-जाँ है ज़िंदगी
तू इसे पैमाना-ए-इमरोज़-ओ-फ़र्दा से न नाप
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
इक उमर है अपनी हर साअत इमरोज़ है अपना हर फ़र्दा
ये शाम-ओ-सहर ये शम्स-ओ-क़मर ये अख़्तर-ओ-कौकब अपने हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मुज़्महिल साअत-ए-इमरोज़ की बे-रंगी से
याद-ए-माज़ी से ग़मीं दहशत-ए-फ़र्दा से निढाल
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
मजीद अमजद
नज़्म
मैं आसमान के साथ फैली शाम की नारंजी रौशनी हूँ
या सूरज की आँख में रेंगती सुर्ख़ धार?
ज़ाहिद इमरोज़
नज़्म
मैं ने इक दिन ख़्वाब में देखा कि इक मुझ सा फ़क़ीर
गर्दिश-ए-पैमाना-ए-इमरोज़-ओ-फ़र्दा का असीर