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नज़्म
जो करेगा इम्तियाज़-ए-रंग-ओ-ख़ूँ मिट जाएगा
तुर्क-ए-ख़र्गाही हो या आराबी-ए-वाला-गुहर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जो तू समझे तो आज़ादी है पोशीदा मोहब्बत में
ग़ुलामी है असीर-ए-इम्तियाज़-ए-मा-ओ-तू रहना
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मगर इस की उजरत भला तुम कहाँ दे सकोगे!''
वो फिर मुज़्तरिब हो के बे-इख़्तियारी से हँसने लगी थी!
नून मीम राशिद
नज़्म
नज़ीर बनारसी
नज़्म
हाँ बता दे हम को भी ऐ रूह-ए-अर्बाब-ए-नियाज़
किस तरह मिटता है आख़िर रंग-ओ-ख़ूँ का इम्तियाज़
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
खुला है तुझ पे अभी आह राज़-ए-इश्क़ कहाँ
तू बुल-हवस है, तुझे इम्तियाज़-ए-इश्क़ कहाँ
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
कारवान-ए-रफ़्ता को था तेरी यकताई पे नाज़
अस्र-ए-मौजूदा ने भी माना है तेरा इम्तियाज़
मिर्ज़ा मोहम्मद हादी अज़ीज़ लखनवी
नज़्म
शाइ'र-ओ-सन्नाअ' हो फ़िक्र-ओ-ख़लिश से बे-नियाज़
ख़्वाजा-ओ-मज़दूर में बाक़ी न हो कुछ इम्तियाज़
सीमाब अकबराबादी
नज़्म
अच्छी बुरी का जब तो नहीं इम्तियाज़ है
बे-माएगी पर अपनी फ़क़त तुझ को नाज़ है
मिर्ज़ा अल्ताफ़ हुसैन आलिम लखनवी
नज़्म
दिखलाएँ किस मज़े से अब के बहार होली
खेले हैं सब जम्अ' हो क्या गुल-एज़ार होली
लुत्फ़ुन्निसा इम्तियाज़
नज़्म
ख़ल्वत-ए-ग़म के दरीचों पे ये दस्तक कैसी
ऐ मिरी फ़ख़्र-ए-वफ़ा रश्क-ए-चमन जान-ए-हया