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नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
ख़ाक-ए-सहरा पे जमे या कफ़-ए-क़ातिल पे जमे
फ़र्क़-ए-इंसाफ़ पे या पा-ए-सलासिल पे जमे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
'गाँधी' हो कि 'ग़ालिब' हो इंसाफ़ की नज़रों में
हम दोनों के क़ातिल हैं दोनों के पुजारी हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
बाग़-ए-इंसानी में चलने ही पे है बाद-ए-ख़िज़ाँ
आदमिय्यत ले रही है हिचकियों पर हिचकियाँ