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नज़्म
अगर ऐ शम'-ए-दिल जलना ही था तुझ को तो जलना था
किसी बेकस की तुर्बत पर चराग़-ए-नीम-जाँ हो कर
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
हिलाल-ए-'ईद को क्यों ख़ंजर-ए-नाज़-ओ-अदा कहिए
बुरा क्या है जो मेहराब-ए-जबीन-ए-दिल-रुबा कहिए
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
क़ुलूब-ए-सख़्त की संगीन दीवारों से टकराता
सुकूत-ए-शब में इक टूटे हुए दिल की सदा होता
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
अगर सोज़-ए-यक़ीं दिल में है आँखें देख ही लेंगी
छुपा रक्खेगा मंज़िल को ग़ुबार-ए-कारवाँ कब तक
अहसन अहमद अश्क
नज़्म
चमकते हुए सब बुतों को मिटा दो
कि अब लौह-ए-दिल से हर इक नक़्श हर्फ़-ए-ग़लत की तरह मिट चुका है
फ़ख़्र-ए-आलम नोमानी
नज़्म
गुल से अपनी निस्बत-ए-देरीना की खा कर क़सम
अहल-ए-दिल को इश्क़ के अंदाज़ समझाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
कुछ इस तरह से बढ़ा दिल में ज़ौक़-ए-आज़ादी
कि रफ़्ता रफ़्ता तमन्ना जवान होती गई
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
मुझे तेरे तसव्वुर से ख़ुशी महसूस होती है
दिल-ए-मुर्दा में भी कुछ ज़िंदगी महसूस होती है
कँवल एम ए
नज़्म
यूँ फ़ज़ाओं में रवाँ है ये सदा-ए-दिल-नशीं
ज़ेहन-ए-शाइर में हो जैसे इक अछूता सा ख़याल