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नज़्म
तेज़-तर होती हुई मंज़िल-ब-मंज़िल दम-ब-दम
रफ़्ता रफ़्ता अपना असली रूप दिखलाती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अपने फ़रज़ंद से फ़ारूक़-ए-मोअज़्ज़म ने कहा
तुम को है हालत-ए-असली की हक़ीक़त पे उबूर
शिबली नोमानी
नज़्म
यही सरचश्मा-ए-असली है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का
बग़ैर इस के बशर होना भी है इक सख़्त बीमारी
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
हक़ीक़त का असली तनाज़ुर बहाल होने को है
तुम्हारे दुश्मन फ़सीलों के तसव्वुर में महसूर हैं
अहमद जावेद
नज़्म
अब हिन्द की असली ईद हुई जो आज़ादी की दीद हुई
पढ़ पढ़ के नमाज़-ए-आज़ादी अब रूठे हुओं को मना डालें
कँवल डिबाइवी
नज़्म
ओ रहम पहले ढीले और फिर सर्द पड़ जाते हैं
और हमारे चेहरे अपनी असली हालत पर आ जाते हैं