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नज़्म
तेज़-तर होती हुई मंज़िल-ब-मंज़िल दम-ब-दम
रफ़्ता रफ़्ता अपना असली रूप दिखलाती हुई
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
अपने फ़रज़ंद से फ़ारूक़-ए-मोअज़्ज़म ने कहा
तुम को है हालत-ए-असली की हक़ीक़त पे उबूर
शिबली नोमानी
नज़्म
यही सरचश्मा-ए-असली है तहज़ीब-ओ-तमद्दुन का
बग़ैर इस के बशर होना भी है इक सख़्त बीमारी
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
अब हिन्द की असली ईद हुई जो आज़ादी की दीद हुई
पढ़ पढ़ के नमाज़-ए-आज़ादी अब रूठे हुओं को मना डालें