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नज़्म
टोपी ओढ़ चूहा इतराया बना चकोरा बारम-बार
फिर अपनी लम्बी सी दुम में बाँधी छोटी सी तलवार
फ़रहत क़मर
नज़्म
क्यूँ जी पर बोझ उठाता है इन गौनों भारी भारी के
जब मौत का डेरा आन पड़ा फिर दूने हैं ब्योपारी के
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
अगर ख़ल्वत में तू ने सर उठाया भी तो क्या हासिल
भरी महफ़िल में आ कर सर झुका लेती तो अच्छा था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
ख़रोश-ए-उम्र के इत्माम तक इक बार उठाना है
अनासिर मुंतशिर हो जाने नब्ज़ें डूब जाने तक
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
वफ़ा ख़ुद की है और मेरी वफ़ा को आज़माया है
मुझे चाहा है मुझ को अपनी आँखों पर बिठाया है