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नज़्म
ये शब ओ रोज़, मह ओ साल गुज़र जाएँगे
हम से बे-मेहर ज़माने की नज़र के अतवार
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
नज़्म
अगर मैं वो ख़त न लिखता तो मेरे दोस्त नाराज़ हो जाते
और कहते हम इतवार के दिन तुम्हारे साथ
ज़ीशान साहिल
नज़्म
दो बूँद भी पानी बरसा तो हो जाएगा फ़ौरन रेनी डे
हफ़्ते में तो कम से कम छे दिन इतवार मनाएँगे हम सब
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
नानक का कबित बन जाती है मीरा का भजन बन जाता है
दिल दिल से जो हम आहंग हुए अतवार मिले अंदाज़ मिले