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नज़्म
खुला है मय-कदे का दर और इज़्न-ए-आम है सब को
वहाँ पर आज रिंदों की क़तार अंदर क़तार आई
जयकृष्ण चौधरी हबीब
नज़्म
चमन में जिस से है इज़्न-ए-शगुफ़्त-ए-ग़ुन्चा-ओ-गुल
गुदाज़ क़ल्ब वो बख़्शा है तुझ को क़ुदरत ने
मसूद अख़्तर जमाल
नज़्म
क़ैद से यूसुफ़ को तू ने इज़्न-ए-आज़ादी दिया
इस भयानक ख़्वाब से आज़ाद कर मुझ को ख़ुदा
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
आनंद नारायण मुल्ला
नज़्म
तब नज़ारे नज़र-आश्ना
इज़्न-ए-आवारगी ज़ाद-ए-अफ़्सुर्दगी दे के थर्राए बा-चश्म-ए-तर