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नज़्म
मलाल ऐसा भी क्या जो ज़ेहन को हर ख़्वाब से महरूम कर दे
जमाल-ए-बाग़-ए-आइंदा के हर इम्कान को मादूम कर दे
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
अब्दुल अहद साज़
नज़्म
फिर भी कहते हो कि बस हाल ही की पर्वा करो
वक़्त-ए-आइंदा महज़ ख़्वाब हुआ करता है
आदित्य पंत नाक़िद
नज़्म
जिस के मौजूद ही में ख़ुद को समोया जाए
वक़्त-ए-आइंदा को भी जिस में डुबोया जाए
मोहम्मद ज़ुबैर ख़ालिद
नज़्म
वही इक अजनबी वारफ़्तगी और रक़्स का लम्हा
कहीं पर दौर-ए-आइंदा के मौसम की समाअ'त में
पीरज़ादा क़ासिम
नज़्म
जिस तसव्वुर से चराग़ाँ है सर-ए-जादा-ए-ज़ीस्त
उस तसव्वुर की हज़ीमत का गुनहगार बनूँ