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नज़्म
दयार-ए-शर्क़ की आबादियों के ऊँचे टीलों पर
कभी आमों के बाग़ों में कभी खेतों की मेंडों पर
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
कि गुज़रे कोई क़ाफ़िला जादा-ए-रोज़-ओ-शब से
तो पूछूँ कि दरमांदगी की सज़ा क्या है मुझ को बताओ
हुरमतुल इकराम
नज़्म
तुम्हारे जादा-ए-गुल-रंग की ये अहमरीं शमएँ
जलाई हैं हम ऐसे ही असीर-ए-दाम लोगों ने
सलाम मछली शहरी
नज़्म
जिस तसव्वुर से चराग़ाँ है सर-ए-जादा-ए-ज़ीस्त
उस तसव्वुर की हज़ीमत का गुनहगार बनूँ
साहिर लुधियानवी
नज़्म
मुक़ल्लिद जो नहीं इस का वो पहुँचेगा न मंज़िल पर
सर-ए-हर-जादा-ए-मंज़िल है मीर-ए-कारवाँ उर्दू
अलम मुज़फ़्फ़र नगरी
नज़्म
दिल को हो शाहज़ादी-ए-मक़्सद की धुन लगी
हैराँ सुराग़-ए-जादा-ए-मंज़िल में हम भी हों
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
इमाम और मुक़तदी सफ़ीरान-अहल-ए-ईमाँ
हुज़ूर-याबी की नुदरतों से कलाम करते सलाम करते