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नज़्म
न ज़ौक़-ए-जाम-ओ-मय-कदा न बुत-कदे की आरज़ू
न तौफ़ कू-ए-यार का न हसरतें न जुस्तुजू
क़ैसर अमरावतवी
नज़्म
और इक जाम-ए-मय-ए-तल्ख़ चढ़ा लूँ तो चलूँ
अभी चलता हूँ ज़रा ख़ुद को सँभालूँ तो चलूँ
मुईन अहसन जज़्बी
नज़्म
''या हाथों-हाथ लो मुझे मानिंद-ए-जाम-ए-मय''
''या थोड़ी दूर साथ चलो मैं नशे में हूँ''
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
धरी हुई हैं बाग़ में इधर-उधर सुराहियाँ
छलक रहे हैं जाम-ए-मय ब-फ़ैज़-ए-साक़ी-ए-जवाँ
अर्श मलसियानी
नज़्म
दौड़ा मय-ख़्वार कि इक जाम-ए-मय-ए-तुंद पिए
ख़्वाहिश-ए-मर्ग मिरे सीने में होने लगी ज़ब्ह
मुईन अहसन जज़्बी
नज़्म
जाम-ए-आतिश-ज़ेर-ए-पा की ओट ले कर साक़िया
बोतलों में डूब जाने का ज़माना आ गया
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
ज़रा हमारे ये शाम-ओ-सहर सँवर जाएँ
तो हम भी ज़ुल्फ़-ओ-रुख़-ए-मह-वशाँ की बात करें