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नज़्म
और इक जाम-ए-मय-ए-तल्ख़ चढ़ा लूँ तो चलूँ
अभी चलता हूँ ज़रा ख़ुद को सँभालूँ तो चलूँ
मुईन अहसन जज़्बी
नज़्म
या'नी हम भी दस्त-ए-क़ुदरत में मिसाल-ए-जाम हैं
और गिरफ़्तार-ए-बला-ए-गर्दिश-ए-अय्याम हैं
अमजद नजमी
नज़्म
दौड़ा मय-ख़्वार कि इक जाम-ए-मय-ए-तुंद पिए
ख़्वाहिश-ए-मर्ग मिरे सीने में होने लगी ज़ब्ह
मुईन अहसन जज़्बी
नज़्म
ख़्वाह अस्कंदर-ओ-जम हों कि गदायान-ए-ज़लील
जामा-ए-‘अक़्ल से फ़ितरत नहीं होती तब्दील
अफ़सर सीमाबी अहमद नगरी
नज़्म
पहुँचता है हर इक मय-कश के आगे दौर-ए-जाम उस का
किसी को तिश्ना-लब रखता नहीं है लुत्फ़-ए-आम उस का
ज़फ़र अली ख़ाँ
नज़्म
बिर्ज लाल रअना
नज़्म
अफ़यूँ का दौर भी है मय-ए-अर्ग़वाँ के बाद
जाम-ए-सिफ़ाल हाथ में है जाम-ए-जम के साथ
इस्मतुल्लाह इस्मत बेग
नज़्म
वो तेरे होंटों के जाम-ए-मय-गूँ से
मेरे होंटों की तिश्नगी को मगस की मानिंद अपने सपने में जा समोती
अबू सईद क़ुरैशी
नज़्म
धरी हुई हैं बाग़ में इधर-उधर सुराहियाँ
छलक रहे हैं जाम-ए-मय ब-फ़ैज़-ए-साक़ी-ए-जवाँ
अर्श मलसियानी
नज़्म
हो अगर हाथों में तेरे ख़ामा-ए-मोजिज़ रक़म
शीशा-ए-दिल हो अगर तेरा मिसाल-ए-जाम-ए-जम