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नज़्म
ये मुमकिन है कि क़ौमों को मिटा दे गर्दिश-ए-आलम
मगर कोई मिटा सकता नहीं उर्दू की अज़्मत को
अलम मुज़फ़्फ़र नगरी
नज़्म
ज़ेहन-ए-आदम में है अफ़्कार की दुनिया आबाद
क़ल्ब-ए-इंसाँ में अमानत हैं अभी ग़म कितने
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
ये हुकूमत ये ग़ुलामी ये बग़ावत की उमंग
क़ल्ब-ए-आदम के ये रिसते हुए कोहना नासूर
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
दो शम्ओं' की लौ पेचाँ जैसे इक शो'ला-ए-नौ बन जाने की
दो धारें जैसे मदिरा की भरती हुइ किसी पैमाने की
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
मोहब्बत एक तोहफ़ा है मोहब्बत एक दौलत है
मोहब्बत बाइ'स-ए-इम्काँ मोहब्बत जान-ए-आलम है
मुख़्तार टोंकी
नज़्म
कैसे कैसे अक़्ल को दे कर दिलासे जान-ए-जाँ
रूह को तस्कीन दी है दिल को समझाया भी है