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नज़्म
ज़ेहन-ए-आदम में है अफ़्कार की दुनिया आबाद
क़ल्ब-ए-इंसाँ में अमानत हैं अभी ग़म कितने
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
दो शम्ओं' की लौ पेचाँ जैसे इक शो'ला-ए-नौ बन जाने की
दो धारें जैसे मदिरा की भरती हुइ किसी पैमाने की
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
मोहब्बत बाइ'स-ए-इम्काँ मोहब्बत जान-ए-आलम है
मोहब्बत ज़ेवर-ए-इंसाँ मोहब्बत हुस्न-ए-आदम है
मुख़्तार टोंकी
नज़्म
रियाज़ी हो कि मंतिक़ फ़ल्सफ़ा हो या तसव्वुफ़ हो
सब इस की बज़्म में मौजूद हैं और जान-ए-महफ़िल हैं
अलम मुज़फ़्फ़र नगरी
नज़्म
ख़ैर अब हम मुतमइन यूँ हैं कि जान-ए-आरज़ू
हम ने कुछ खो भी दिया है और कुछ पाया भी है