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नज़्म
आरिज़-ए-पुर-नूर झलका गेसु-ए-शब-रंग से
जू-ए-बार-ए-साज़-ए-दिल निकली सुकूत-ए-संग से
मयकश अकबराबादी
नज़्म
ख़मोशियों में यहाँ एक हश्र बरपा है
कहाँ से ढूँड के लम्हात-ए-पुर-सुकूँ लाएँ
ख्वाजा मंज़र हसन मंज़र
नज़्म
हर तरफ़ ख़ामोश गलियाँ ज़र्द-रू गूँगे मकीं
सूने सूने बाम-ओ-दर और उजड़े उजड़े शह-नशीं
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
तेरे दीवाने रहे हैं कितने ही अहल-ए-ख़िरद
तेरे ज़ानू पर सुकूँ की नींद सोए नेक-ओ-बद
मोअज़्ज़म अली खां
नज़्म
वक़्त को सहरा कहूँ या बहर-ए-बे-साहिल कहूँ
रात है रेग-ए-रवाँ की लहर या कि मौज-ए-आब-ए-ज़ि़ंदगी