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नज़्म
न उट्ठा जज़्बा-ए-ख़ुर्शीद से इक बर्ग-ए-गुल तक भी
ये रिफ़अत की तमन्ना है कि ले उड़ती है शबनम को
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मैं अक्सर उन के तसव्वुर में डूब जाता था
वफ़ूर-ए-जज़्बा से हो जाती थी मिज़ा पुर-नम
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
दबेगी कब तलक आवाज़-ए-आदम हम भी देखेंगे
रुकेंगे कब तलक जज़्बात-ए-बरहम हम भी देखेंगे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
वो प्यार जिस में न हो अक़्ल ओ दिल की यक-जेहती
किसी तरीक़ से जज़्बा नहीं मोहब्बत का
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
मोहब्बत का सभी एलान कर जाते हैं महफ़िल में
कि इस के वास्ते जज़्बा है हमदर्दी का हर दिल में
मंज़र भोपाली
नज़्म
क्या अहल-ए-दिल में जज़्बा-ए-ग़ैरत नहीं रहा
क्या अज़्म-ए-सर-फ़रोशी-ए-मर्दां चला गया
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
मौज-ए-ख़ूँ जब तक रवाँ रहती है उस का सुर्ख़ रंग
जज़्बा-ए-शौक़-ए-शहादत दर्द, ग़ैज़ ओ ग़म का रंग