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नज़्म
ये लड़का पूछता है जब तो मैं झल्ला के कहता हूँ
वो आशुफ़्ता-मिज़ाज अंदोह-परवर इज़्तिराब-आसा
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
सर्द रातों का हसीं इक ख़्वाब है चेहरा तिरा
क्या कहूँ बस मंज़र-ए-नायाब है चेहरा तिरा
जय राज सिंह झाला
नज़्म
एक झाला सा बरस कर खुल गया चिंगारियों का
कितनी तहज़ीबें शहाबी टिमटिमा कर बुझ गईं
शफ़ीक़ फातिमा शेरा
नज़्म
हमारी तरह शायद मास्टर साहब भी हैं भूके
अभी झल्ला के दो लड़कों को वो भी मार बैठे हैं
सय्यदा फ़रहत
नज़्म
क्या जगमग जगमग करती हैं क़िंदीलें इन मह-पारों की
क्या जोत झला-झल होती है इन सुंदर रूप सितारों की