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नज़्म
उक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकले
सितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकले
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जोश मलीहाबादी
नज़्म
जब उस के होंट आ जाते थे अज़ ख़ुद मेरे होंटों तक
झपक जाती थीं आँखें आसमाँ पर माह ओ अंजुम की
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
ज़रा जो दम भर को आँख झपकी, ये देखता हूँ नई तजल्ली
तिलिस्म सूरत मिटा रहे हैं, जमाल मअनी बना रहे हैं
जिगर मुरादाबादी
नज़्म
चीरे के बीच में चीरा है और पटके बीच जो है पटका
क्या कहिए और 'नज़ीर' आगे है ज़ोर तमाशा झट-पटका