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नज़्म
जो नहीं लाते हैं ख़ातिर में ख़ुशामद को मिरी
वो झिड़क देते हैं मुझ को उन से घबराता हूँ मैं
प्रेम लाल शिफ़ा देहलवी
नज़्म
जिन के सर मुंतज़िर-ए-तेग़-ए-जफ़ा हैं उन को
दस्त-ए-क़ातिल को झटक देने की तौफ़ीक़ मिले
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
तेरे होंटों पे तबस्सुम की वो हल्की सी लकीर
मेरे तख़्ईल में रह रह के झलक उठती है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
यूँ ज़बान-ए-बर्ग से गोया है उस की ख़ामुशी
दस्त-ए-गुल-चीं की झटक मैं ने नहीं देखी कभी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
सितमगरों की सितमगरी पर हज़ार-हा वार कर चुकी है
कोई बताओ वो कौन सा मोड़ है जहाँ हम झिजक गए हैं
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
जब उस के होंट आ जाते थे अज़ ख़ुद मेरे होंटों तक
झपक जाती थीं आँखें आसमाँ पर माह ओ अंजुम की
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
झड़ कर रही हैं झड़ियाँ नाले उमँड रहे हैं
बरसे है मुँह झड़ा झड़ बादल घुमंड रहे हैं