aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "john"
उस ने इतनी किताबें चाट डालींकि उस की औरत के पैर काग़ज़ की तरह हो गएवो रोज़ काग़ज़ पे अपना चेहरा लिखता और गंदा होताउस की औरत जो ख़ामोशी काढ़े बैठी थीकाग़ज़ों के भूँकने पर सारतर के पास गईतुम रैम्बो और फ़्राइड से भी मिल आए हो क्यासैफ़ू मेरी सैफ़ू मीराबाई की तरह मत बोलोमैं समझ गई अब उस की आँखेंकीट्स की आँखें हुई जाती हैंमैं जो सोहनी का घड़ा उठाए हुए थीअपना नाम लैला बता चुकी थीमैं ने कहालैला मजमे की बातें मेरे सामने मत दोहराया करोतन्हाई भी कोई चीज़ होती हैशेक्सपियर के ड्रामों से चुन चुन कर उस ने ठुमके लगाएमुझे तन्हा देख करसारतर फ़्राइड के कमरे में चला गयावो अपनी थ्योरी से गिर गिर पड़तामैं समझ गई उस की किताब कितनी हैलेकिन बहर हाल सारतर थाऔर कल को मजमे में भी मिलना थामैं ने भीड़ की तरफ़ इशारा किया तो बोलाइतने सारे सार्त्रों से मिल कर तुम्हें क्या करना हैअगर ज़ियादा ज़िद करती हो तो अपने वारिस 'शाह'हीर सय्याल के कमरों में चले चलते हैंसारतर से इस्तिआरा मिलते हीमैं ने एक तन्क़ीदी नशिस्त रक्खीमैं ने आधा कमरा भी बड़ी मुश्किल से हासिल किया थासो पहले आधे फ़्राइड को बुलायाफिर आधे रैम्बो को बुलायाआधी आधी बात पूछनी शुरूअ कीजॉन डन क्या कर रहा हैसैकेंड हैंड शाइरों से नजात चाहता हैचोरों से सख़्त नालाँ हैदाँते इस वक़्त कहाँ हैवो जहन्नम से भी फ़रार हो चुका हैउस को शुबहा थावो ख़्वाजा-सराओं से ज़ियादा देर मुक़ाबला नहीं कर सकताअपने पस-मंज़र मेंएक कुत्ता मुसलसल भूँकने के लिए छोड़ गया हैइस कुत्ते की ख़सलत क्या हैबियातर्चे की याद में भूँक रहा हैतुम्हारा तसव्वुर क्या कहता हैसार्त्रों की तसव्वुर के लिहाज़ सेअब उस का रुख़ गोएटे के घर की तरफ़ हो गया है
या ख़ुदा हिन्द पर करम फ़रमाइस की तकलीफ़ कल-अदम फ़रमाहैं परेशाँ बहुत हवास इस केनहीं हमदर्द कोई पास इस केफ़क्र-ओ-फ़ाक़ा से पाएमाल है अबक़र्ज़ में इस का बाल बाल है अबन ही सनअ'त न अब तिजारत हैसारी आसूदगी वो ग़ारत हैइल्म-ओ-फ़न से है इस का घर ख़ालीअक़्ल ओ इदराक से है सर ख़ालीअच्छे अतवार मिट गए इस केनेक किरदार मिट गए इस केख़ुल्क़ है अब न मेहर-ओ-उल्फ़त हैआतिशी है न अब उख़ुव्वत हैरंग बिल्कुल है मुल्क का बदलासारा पानी है चाह का गदलाहर तरफ़ जहल है लड़ाई हैदुश्मन आपस में भाई भाई हैन मोहब्बत है अब न हमदर्दीन दिलेरी न अब जवाँ-मर्दीन रवा-दारी ओ शराफ़त हैन अब अम्न-ओ-अमान ओ राहत हैहर तरफ़ है फ़साद हंगामाकोई रुस्तम है और कोई गामाअब कहाँ सुल्ह-ओ-ख़ैर की बातेंजब हैं कानों में ग़ैर की बातेंजॉन-बिल की हैं साज़िशें जारीमुल्क पर हैं नवाज़िशें जारीएक से है कभी शनासाईदूसरे के लिए कभी साईकभी इन को लड़ा दिया सब सेकभी उन को भिड़ा दिया सब सेकभी इन को पुलिस ओ थाना हैऔर कभी उन को जेल-ख़ाना हैयही मंज़र यहाँ है शाम-ओ-सहरबस यही हो रहा है आठ पहरजानता है हर इक ये सब बातेंफिर भी ख़ाली नहीं हवालातेंवही जंग-ओ-जदल वही झगड़ेवही बुग़ज़-ओ-एनाद के रगड़ेया ख़ुदा दे हमें वो अक़्ल-ए-सलीमकि समझ हम सकें हर इक स्कीमपड़ सके फिर न कोई ज़द हम परखुल सकें सारे नेक-ओ-बद हम परख़त्म कर दें ये तफ़रक़ा-साज़ीआग में झोंक दें तबर-याज़ीसब करें मिल के मुल्क की ख़िदमतदूर हो इस की उसरत-अो-नकबतहिकमत ओ फ़न वतन में फैलाएँशाहराहें मसल की खुल जाएँइल्म ओ साइंस मुल्क में भर देंइस ज़मीं को हम आसमाँ कर देंहम पे खुल जाएँ सब वो अक़्ल के राज़हो इस का यूरोप के तुर्रा-ए-एज़ाज़सनअतों की हो गर्म-बाज़ारीगाँव गाँव में हों मिलें जारीरेल, मोटर, जहाज़, तय्यारेख़ुद ये तयार हम करें सारेकभी सहरा हो मुस्तक़र अपनाहो कभी टापूओं में घर अपनामैनचेस्टर पे ख़ाक डालेंगेघर से जापान को निकालें हमन रहें हम किसी के भी मुहताजमुल्क अपना हो और अपना राजहम में गर इत्तिहाद हो जाएमुल्क आबाद शाद हो जाए
था हुस्न-ए-इत्तिफ़ाक़ कि टी-कोरनर में कलक़िस्मत से मेरी मिल गए इक इंट्लेकचुवलबैठे हुए थे ज़ाविया-ए-क़ाइमा बनेजैसे महाज़ पर हो कोई फ़ील्ड-मार्शलरक्खा था पोर्टफोलियो बैग एक मेज़ परऔर उस से मुत्तसिल थीं किताबें डबल डबलमोटी सी मैगज़ीन भी थी इक धरी हुईजिस के सर-ए-वरक़ पे थे सर-जॉन-माइकलयूँ आलम-ए-ख़याल में डूबे हुए थे आपजैसे दिमाग़ में हो किसी मसअले का हलउलझे हुए थे बाल हजामत भी थी बढ़ीचेहरे पे इद्दआ-ए-मतानत जबीन पे बलमैं ने ब-सद खुलूस-ओ-अदब चाय पेश कीऔर उस के बा'द आया रुख़-ए-गुफ़्तुगू निकलमौसम के तज़्किरे से चली बात अदब की सम्तअपनी जगह पर आप का हर क़ौल था अटलहर बात में कहीं का हवाला ज़रूर थाइस से ग़रज़ न थी कि हवाला हो बर-महलउर्दू के इर्तिक़ा की तरफ़ बात जब मुड़ीकहने लगे कि तेज़ है रफ़्तार आज-कलमैं ने कहा कि ज़ह्न अभी तक ग़ुलाम हैंजाता नहीं दिमाग़ से तक़लीद का ख़ललअफ़्कार मुस्तआ'र हैं तख़्ईल मुस्तआ'रहर नुक्ता बे-मक़ाम है हर लफ़्ज़ बे-महलतन्क़ीद छेड़-छाड़ है तहक़ीक़ खोद-खादचलते हैं यूँ क़लम कि चले जिस तरह से हलअफ़्सानों के मिज़ाज में अफ़्साना-पन नहींइस शुत्र-ए-बे-महार की सीधी है कौन कलपरियों के बदले इस में मशीनों का नाच हैइक जूट मिल बना है परी-ख़ाना-ए-ग़ज़लपहले था फ़ारसी के ततब्बो पर इफ़्तिख़ारअब मग़रिबी अदब की ग़ुलामी है बे-ख़ललबोले फ़ुज़ूल आप न बकवास कीजिएअब कारवान-ए-फ़िक्र की राहें गईं बदलमैं ने कहा कि चंद अदीबों का नाम लेंअपनी डगर बना के जो चलते हैं आज-कलबोले कि एक मोसीयो-ज़ाँ-पाल सारतरजिस ने बना दिया है हमें इंट्लेकचुवलऔर दूसरा है जेम्स-ज्वाइस अदीब-ए-अस्रपुर्ज़े दिल-ओ-दिमाग़ के देता है जो बदलमैं ने कहा हुज़ूर ये उर्दू का था सवालबोले कि आप बहस करें मुझ से ये मजाल
तुम जब आओगी तो खोया हुआ पाओगी मुझेमेरी तन्हाई में ख़्वाबों के सिवा कुछ भी नहींमेरे कमरे को सजाने की तमन्ना है तुम्हेंमेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं
हर बार मेरे सामने आती रही हो तुमहर बार तुम से मिल के बिछड़ता रहा हूँ मैंतुम कौन हो ये ख़ुद भी नहीं जानती हो तुममैं कौन हूँ ये ख़ुद भी नहीं जानता हूँ मैंतुम मुझ को जान कर ही पड़ी हो अज़ाब मेंऔर इस तरह ख़ुद अपनी सज़ा बन गया हूँ मैं
चाहता हूँ कि भूल जाऊँ तुम्हेंऔर ये सब दरीचा-हा-ए-ख़यालजो तुम्हारी ही सम्त खुलते हैंबंद कर दूँ कुछ इस तरह कि यहाँयाद की इक किरन भी आ न सके
मैं शायद तुम को यकसर भूलने वाला हूँशायद जान-ए-जाँ शायद
मक्के मदीने के पाक मुसल्ले पयम्बर घर नवासेशाह-ए-मर्दां अमीर-ऊल-मोमिनीन हज़रत-'अली' के पोतेहज़रत इमाम-'हसन' हज़रत इमाम-'हुसैन' के पोतेहज़रत इमाम-अली-'नक़ी' के पोतेसय्यद-'जाफ़र' सानी के पोतेसय्यद अबुल-फ़रह सैदवाइल-वास्ती के पोतेमीराँ सय्यद-'अली'-बुज़ुर्ग के पोतेसय्यद-'हुसैन'-शरफ़ुद्दीन शाह-विलायत के पोतेक़ाज़ी सय्यद-'अमीर'-अली के पोतेदीवान सय्यद-'हामिद' के पोतेअल्लामा सय्यद-'शफ़ीक़'-हसन-एलिया के पोतेसय्यद-'जौन'-एलिया हसनी-उल-हुसैनी सपूत-जाह''
मैं भूल जाऊँ तुम्हेंअब यही मुनासिब हैमगर भुलाना भी चाहूँ तो किस तरह भूलूँकि तुम तो फिर भी हक़ीक़त होकोई ख़्वाब नहींयहाँ तो दिल का ये आलम है क्या कहूँकम-बख़्तभुला न पाया वो सिलसिलाजो था ही नहींवो इक ख़यालजो आवाज़ तक गया ही नहींवो एक बातजो मैं कह नहीं सका तुम सेवो एक रब्तजो हम में कभी रहा ही नहींमुझे है याद वो सबजो कभी हुआ ही नहीं
धुँद छाई हुई है झीलों परउड़ रहे हैं परिंद टीलों परसब का रुख़ है नशेमनों की तरफ़बस्तियों की तरफ़ बनों की तरफ़
वो किताब-ए-हुस्न वो इल्म ओ अदब की तालीबावो मोहज़्ज़ब वो मुअद्दब वो मुक़द्दस राहिबाकिस क़दर पैराया परवर और कितनी सादा-कारकिस क़दर संजीदा ओ ख़ामोश कितनी बा-वक़ारगेसू-ए-पुर-ख़म सवाद-ए-दोश तक पहुँचे हुएऔर कुछ बिखरे हुए उलझे हुए सिमटे हुएरंग में उस के अज़ाब-ए-ख़ीरगी शामिल नहींकैफ़-ए-एहसासात की अफ़्सुर्दगी शामिल नहींवो मिरे आते ही उस की नुक्ता-परवर ख़ामुशीजैसे कोई हूर बन जाए यकायक फ़लसफ़ीमुझ पे क्या ख़ुद अपनी फ़ितरत पर भी वो खुलती नहींऐसी पुर-असरार लड़की मैं ने देखी ही नहींदुख़तरान-ए-शहर की होती है जब महफ़िल कहींवो तआ'रुफ़ के लिए आगे कभी बढ़ती नहीं
कौन आया हैकोई नहीं आया है पागल
वो 'जौन' जो नज़र आता है उस का ज़िक्र नहींतुम अपने 'जौन' का जो तुम में है भरम रखनाअजीब बात है जो तुम से कह रही हूँ मैंख़याल मेरा ज़ियादा और अपना कम रखनाहो तुम बला के बग़ावत-पसंद तल्ख़-कलामख़ुद अपने हक़ में इक आज़ार हो गए हो तुमतुम्हारे सारे सहाबा ने तुम को छोड़ दियामुझे क़लक़ है कि बे-यार हो गए हो तुम
तुम्हारे नाम तुम्हारे निशाँ से बे-सरोकारतुम्हारी याद के मौसम गुज़रते जाते हैंबस एक मन्ज़र-ए-बे-हिज्र-ओ-विसाल है जिस मेंहम अपने आप ही कुछ रंग भरते जाते हैं
सफ़ेद शर्ट थी तुम सीढ़ियों पे बैठे थेमैं जब क्लास से निकली थी मुस्कुराते हुएहमारी पहली मुलाक़ात याद है ना तुम्हेंइशारे करते थे तुम मुझ को आते जाते हुएतमाम रात वो आँखें न भूलती थीं मुझेकि जिन में मेरे लिए 'इज़्ज़त और वक़ार दिखेमुझे ये दुनिया बयाबान थी मगर इक दिनतुम एक बार दिखे और बे-शुमार दिखेमुझे ये डर था कि तुम भी कहीं वही तो नहींजो जिस्म पर ही तमन्ना के दाग़ छोड़ते हैंख़ुदा का शुक्र है कि तुम उन से मुख़्तलिफ़ निकलेजो फूल तोड़ के ग़ुस्से में बाग़ छोड़ते हैंज़ियादा वक़्त न गुज़रा था इस त'अल्लुक़ कोकि इस के बा'द वो लम्हा क़रीं क़रीं आयाछुआ था तुम ने मुझे और मुझे मोहब्बत परयक़ीन आया था लेकिन कभी नहीं आयाफिर उस के बा'द मेरा नश्शा-ए-सुकूत गयामैं कश्मकश में थी तुम मेरे कौन लगते होमैं अमृता तुम्हें सोचूँ तो मेरे साहिर होमैं फ़ारेहा तुम्हें देखूँ तो जौन लगते होहम एक साथ रहे और हमें पता न चलात'अल्लुक़ात की हद-बंदियाँ भी होती हैंमोहब्बतों के सफ़र में जो रास्ते हैं वहीहवस की सम्त में पगडंडियाँ भी होती हैंतुम्हारे वास्ते जो मेरे दिल में है 'हाफ़ी'तुम्हें मैं काश ये सब कुछ कभी बता पातीऔर अब मज़ीद न मिलने की कोई वजह नहींबस अपनी माँ से मैं आँखें नहीं मिला पाती
मुझ से पहले के दिनअब बहुत याद आने लगे हैं तुम्हेंख़्वाब-ओ-ता'बीर के गुम-शुदा सिलसिलेबार बार अब सताने लगे हैं तुम्हेंदुख जो पहुँचे थे तुम से किसी को कभीदेर तक अब जगाने लगे हैं तुम्हें
बिसात-ए-ज़िंदगी तो हर घड़ी बिछती है उठती हैयहाँ पर जितने ख़ाने जितने घर हैंसारेख़ुशियाँ और ग़म इनआ'म करते हैंयहाँ पर सारे मोहरेअपनी अपनी चाल चलते हैंकभी महसूर होते हैं कभी आगे निकलते हैंयहाँ पर शह भी पड़ती हैयहाँ पर मात होती हैकभी इक चाल टलती हैकभी बाज़ी पलटती हैयहाँ पर सारे मोहरे अपनी अपनी चाल चलते हैंमगर मैं वो पियादा हूँजो हर घर मेंकभी इस शह से पहले और कभी उस मात से पहलेकभी इक बुर्द से पहले कभी आफ़ात से पहलेहमेशा क़त्ल हो जाता है
ये किताबों की सफ़-ब-सफ़ जिल्देंकाग़ज़ों का फ़ुज़ूल इस्ती'माल
सुना है तुम ने अपने आख़िरी लम्हों में समझा थाकि तुम मेरी हिफ़ाज़त में हो मेरे बाज़ुओं में हो
बरस गुज़रे तुम्हें सोए हुएउठ जाओ सुनती हो अब उठ जाओमैं आया हूँमैं अंदाज़े से समझा हूँयहाँ सोई हुई हो तुमयहाँ रू-ए-ज़मीं के इस मक़ाम-ए-आसमानी-तर की हद मेंबाद-हा-ए-तुंद नेमेरे लिए बस एक अंदाज़ा ही छोड़ा है!
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