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नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
और कभी जब दिन निकला तो बीत गए जुग हुई न रात
हर-सू मह-वश सादा क़ातिल लुत्फ़-ओ-इनायत की सौग़ात
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
कल-जुग में भी मरती है सत-जुग में भी मरती थी
ये बुढ़िया इस दुनिया में सदा ही फ़ाक़े करती थी
साहिर लुधियानवी
नज़्म
पुरानी चाल बे-ढंगी हमारी देखें कब बदले
अभी तक जुग ही बदले थे ग़ज़ब ये है क़रन बदला