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नज़्म
जिस से शादाब है मुद्दत से मिरा ज़ौक़-ए-तलब
आज तक़रीब में ये तर्ज़-ए-मुलाक़ात तिरा
अब्दुल अहद साज़
नज़्म
तबीअत अब तो है आमादा-ए-तर्क-ए-ग़ज़ल-ख़्वानी
चे रा कारी कुनद आक़िल कि बाज़ आयद पशेमानी
असद जाफ़री
नज़्म
तुम्हारे रोज़-ओ-शब से अब कोई निस्बत नहीं लेकिन
तुम्हारा 'अक्स हर लम्हे के आईने में मिलता है
बशर नवाज़
नज़्म
तलब-ओ-तर्क-ए-तलब सिलसिला-ए-बे-पायाँ
मर्ग ही ज़ीस्त का उन्वान है हर ख़ून-शुदा ख़्वाहिश में
वहीद अख़्तर
नज़्म
परतव रोहिला
नज़्म
सोचते थे कि हो ना-वाक़िफ़-ए-आदाब-ए-वफ़ा
तुम में तो तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ का सलीक़ा भी नहीं
नसीम सय्यद
नज़्म
यहीं की थी मोहब्बत के सबक़ की इब्तिदा मैं ने
यहीं की जुरअत-ए-इज़हार-ए-हर्फ़-ए-मुद्दआ मैं ने