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नज़्म
ये बात अजीब सुनाते हो वो दुनिया से बे-आस हुए
इक नाम सुना और ग़श खाया इक ज़िक्र पे आप उदास हुए
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
खाया मिट्टी के बर्तन में, सोए तो बिछौने को तरसे
मुख़तारों पर तन्क़ीदें हैं, बे-चारगियाँ मजबूरों की
जमील मज़हरी
नज़्म
सिरफ़ हराम की कौड़ी का जिन का है बेवपार
उन्हों ने खाया है इस दिन के वास्ते है उधार
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
धूप पड़ी, तो खुल गई आँखें, खुल गया सारा भेद
ग़श खाया, तो दौड़े आए मुंशी, पंडित, वेद
मुस्तफ़ा ज़ैदी
नज़्म
अब हलक़ में उन के जो खाया अटक कर जाएगा
ग़ैर-मुल्कों में न सरमाया भटक कर जाएगा
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
महीने भर के रोज़ों ब'अद हक़ ने दिन ये दिखलाया
अलल-ऐलान खाया दोस्तों के साथ जो पाया
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
गोश्त मछली सब्ज़ियाँ बनिए का राशन दूध घी
मुझ को खाती हैं ये चीज़ें मैं ने कब खाया इन्हें
शकील आज़मी
नज़्म
अभी तो हिज्र का बिस्मिल के ज़ख़्म खाया था
अभी तो कोह-ए-सितम चर्ख़ ने गिराया था
आफ़ताब रईस पानीपती
नज़्म
मगर पछता रहा हूँ अब तिरी बे-ए'तिनाई पर
कि मैं ने क्यूँ मोहब्बत का सुनहरा ज़ख़्म खाया था