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नज़्म
वही मुफ़लिसों की रिवायतें वही मुनइमों की इनायतें
वही कार-ए-ख़ैर की ग़ायतें अभी इंक़िलाब कहाँ हुआ
ज़ेब उस्मानिया
नज़्म
वो ख़ाक-ए-पाक जिस ने तेरे ख़ूँ से कर लिया वुज़ू
सदाक़तें शुजा’अतें इसी से पाएँगी नुमू
एस. ए. रहमान
नज़्म
क़ुमरियाँ मीठे सुरों के साज़ ले कर आ गईं
बुलबुलें मिल-जुल के आज़ादी के गुन गाने लगीं
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
ये क्या मुमकिन नहीं तू आ के ख़ुद अब इस का दरमाँ कर
फ़ज़ा-ए-दहर में कुछ बरहमी महसूस होती है