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नज़्म
जो बात है वो शोख़ी-ए-गुलदस्ता-ए-चमन
जो लफ़्ज़ है बहार-ए-कफ़-ए-गुल-फ़रोश है
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
नूर-ए-शमा नूर
नज़्म
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
ख़्वाब-ए-गिराँ से ग़ुंचों की आँखें न खुल सकीं
गो शाख़-ए-गुल से नग़्मा बराबर उठा किया
आल-ए-अहमद सुरूर
नज़्म
रुख़्साना निकहत लारी उम्म-ए-हानी
नज़्म
रुख़्साना निकहत लारी उम्म-ए-हानी
नज़्म
लाहौर में देखा उसे मदफ़ूँ तह-ए-मर्क़द
गर्द-ए-कफ़-ए-पा जिस की कभी काहकशाँ थी
चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी
नज़्म
हिमायत अली शाएर
नज़्म
फ़िरोज़ नातिक़ ख़ुसरो
नज़्म
शाज़ तमकनत
नज़्म
ख़िज़ाँ तमाम हुई किस हिसाब में लिखिए
बहार-ए-गुल में जो पहुँचे हैं शाख़-ए-गुल को गज़ंद