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नज़्म
अभी हम लोग बच्चे हैं मगर इक दिन जवाँ होंगे
हमीं इक दिन वक़ार-ए-मादर-ए-हिन्दोस्ताँ होंगे
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
तेरे ही नग़्मे से कैफ़-ओ-इम्बिसात-ए-ज़िंदगी
तेरी सौत-ए-सरमदी बाग़-ए-तसव्वुफ़ की बहार
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
और अब ये राह-गुज़र भी है दिल-फ़रेब ओ हसीं
है इस की ख़ाक में कैफ़-ए-शराब-ओ-शेर मकीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ये कैफ़-ओ-रंग-ए-नज़ारा ये बिजलियों की लपक
कि जैसे कृष्ण से राधा की आँख इशारे करे
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
गुलशन-ए-महफ़िल में मानिन्द-ए-सबा आई है तू
सुब्ह-ए-रौशन का पयाम-ए-जाँ-फ़ज़ा लाई है तू
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
आँखों में हुस्न-ए-मस्ती इक कैफ़-ए-ख़ुद-नुमाई
क़दमों में शान-ए-लग़्ज़िश गोया कोई शराबी
वफ़ा बराही
नज़्म
रूह में जिस ने भरी उर्दू के बे-जाँ जाम में
कैफ़-ए-एहसास-ए-अमल है जिस के हर पैग़ाम में