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नज़्म
बे-तेरे क्या वहशत हम को, तुझ बिन कैसा सब्र ओ सुकूँ
तू ही अपना शहर है जानी तू ही अपना सहरा है
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
वो ज़लज़ले कि पहाड़ों के पैर उखड़ जाएँ
बुलूग़ियत की वो टीसें वो कर्ब-ए-नश्व-ओ-नुमा