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नज़्म
वो कारवान-ए-गुल-ए-ताज़ा जिस के मुज़्दे से
दिमाग़-ए-इश्क़ मोअत्तर है और फ़ज़ा मामूर
ख़ुर्शीदुल इस्लाम
नज़्म
निगाह को थी मगर मीर-ए-कारवाँ की तलाश
नज़र जो उट्ठी तो देखा कि एक मर्द-ए-फ़क़ीर
सय्यदा शान-ए-मेराज
नज़्म
कहीं तो कारवान-ए-दर्द की मंज़िल ठहर जाए
किनारे आ लगे उम्र-ए-रवाँ या दिल ठहर जाए
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ज़ुल्फ़ों के पेच-ओ-ख़म में बहारें छुपी हुई
इक कारवान-ए-निकहत-ए-बुसताँ लिए हुए
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
सामने रुकते हैं कितने कारवान-ए-रंग-ओ-बू
जैसे ये ख़ामोशियाँ करती हैं मुझ से गुफ़्तुगू
ख़ुर्शीद अहमद जामी
नज़्म
क़दम चालीसवीं मंज़िल में उस यूसुफ़ ने जब रक्खा
तो पहुँचा कारवान-ए-वहइ आवाज़-ए-जरस हो कर
नज़्म तबातबाई
नज़्म
फिर भी मीर-ए-कारवाँ है आज भी दुनिया में तू
गर तिरे कहने को मानें कारवान-ए-तेज़-गाम