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नज़्म
नून मीम राशिद
नज़्म
है तो गोरिस्ताँ मगर ये ख़ाक-ए-गर्दूं-पाया है
आह इक बरगश्ता क़िस्मत क़ौम का सरमाया है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
रेस्तोराँ में सजे हुए हैं कैसे कैसे चेहरे
क़ब्रों के कत्बों पर जैसे मसले मसले सहरे
अहमद नदीम क़ासमी
नज़्म
ख़ालिक़-ए-लम-यज़ल से उम्मीद-ए-नौ के कासे फैलाए
अपनी पलकों की मुंडेरों पे शफ़क़-रंग लिए