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नज़्म
''बला-कशान-ए-मोहब्बत पे जो हुआ सो हुआ
जो मुझ पे गुज़री मत उस से कहो, हुआ सो हुआ
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ज़ौक़-ए-नज़र असीर-ए-संग हो के जो दर-ब-दर गया
आप गए कशाँ कशाँ इश्क़ जिधर जिधर गया
इज्तिबा रिज़वी
नज़्म
ख़ुद अपने अंजाम के जुनूँ में कशाँ कशाँ राह काटता था
ज़माना अपने जमाल को तर्क कर चुका था
बिलाल अहमद
नज़्म
अमजद नजमी
नज़्म
उस आसमाँ की न उस कहकशाँ की बात करें
गुज़र है अपनी जहाँ हम वहाँ की बात करें