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नज़्म
क्या सख़्त मकाँ बनवाता है ख़म तेरे तन का है पोला
तू ऊँचे कोट उठाता है वाँ गोर गढ़े ने मुँह खोला
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
कल वो मिली जो बचपन में मेरे भाई से खेला करती थी
जाने तब क्या बात थी उस में मुझ से बहुत ही डरती थी
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
कभी खेला जो कोई खेल गंदा मुझ को समझाया
कभी चुग़ली किसी की मैं ने खाई तो बुरा माना
अबुल मुजाहिद ज़ाहिद
नज़्म
पिक्चर भी नहीं देखी हम ने हाकी भी नहीं खेली हम ने
ले ले के किताबें पढ़ते रहे और ख़ूब पढ़ाई की हम ने