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नज़्म
वो सारे ख़्वाब थे क़स्साब जो देखा किया हूँ मैं
ख़राश-ए-दिल से तुम बे-रिश्ता बे-मक़्दूर ही ठहरो
जौन एलिया
नज़्म
बानियों ने था बनाया इस लिए गोया हमें
हम को जब देखें ख़लफ़ अस्लाफ़ को रोया करें
अल्ताफ़ हुसैन हाली
नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
किसी ने ज़हर-ए-ग़म दिया तो मुस्कुरा के पी गए
तड़प में भी सुकूँ न था, ख़लिश भी साज़गार थी
आमिर उस्मानी
नज़्म
है अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहीं
जिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़लिश-ए-दिल से उसे दस्त-ओ-गरेबाँ न करूँ
उस के जज़्बात को मैं शो'ला-ब-दामाँ न करूँ