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नज़्म
ज़ीस्त आशोब-ए-ग़म-ए-मर्ग का तूफ़ाँ ही सही
मिल ही जाता है सफ़ीनों को किनारा आख़िर
सूफ़ी ग़ुलाम मुस्ताफ़ा तबस्सुम
नज़्म
कुछ लोग ये कहते हैं कि अच्छा या बुरा कुछ भी नहीं है
तक़रीब-ए-विलादत हो या हंगाम-ए-दम-ए-मर्ग
बलराज कोमल
नज़्म
अपनी प्यास इक दूसरे के ख़ूँ से बुझा रही है
ये संग-दिल जश्न-ए-मर्ग-ए-अम्बोह-ए-बे-गुनाहाँ मना रहे हैं