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नज़्म
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
पतंगें लूटने वालों को क्या मालूम किस के हाथ का माँझा खरा था और किस की
डोर हल्की थी
इफ़्तिख़ार आरिफ़
नज़्म
राह दुश्वार में इक क़ाफ़िला-ए-निकहत-ओ-नूर
संग-ए-ख़ारा की चटानों के मुक़ाबिल है खड़ा
अंजुम आज़मी
नज़्म
समझ सकता है कौन इस राज़ को जुज़ अहल-ए-मय-ख़ाना
लिबास-ए-सुब्ह में कितनी भयानक शाम है साक़ी
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
यूसुफ़ ज़फ़र
नज़्म
ऐ कि सीने में तिरे अरमान-ए-गुल है बे-क़रार
देखना बेदाद-ए-नोक-ए-ख़ार से भी होशियार