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नज़्म
ये 'ख़ुसरो' 'मीर' 'ग़ालिब' का ख़राबा बेचता क्या है
हमारा 'ग़ालिब'-ए-आज़म था चोर आक़ा-ए-'बेदिल' का
जौन एलिया
नज़्म
उनके दिल जब होंगे याद-ए-मासियत से पाश पाश
तेरे रुख़ पर एक भी होगी न माज़ी की ख़राश
जोश मलीहाबादी
नज़्म
गर्दन-ए-हक़ पर ख़राश-ए-तेग़-ए-बातिल ता-ब-कै?
अहल-ए-दिल के वास्ते तौक़-ओ-सलासिल ता-ब-कै?
जोश मलीहाबादी
नज़्म
तू शनासा-ए-ख़राश-ए-उक़्दा-ए-मुश्किल नहीं
ऐ गुल-ए-रंगीं तिरे पहलू में शायद दिल नहीं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हो न लेकिन आह तेरा शोर-ए-मातम दिल-ख़राश
तेरे नालों की सदा या'नी हो कम कम दिल-ख़राश
सुरूर जहानाबादी
नज़्म
जिस के दिल की धड़कनों में ग़म के फाँसों की ख़राश
बे-कसी जिस का सहारा मुफ़लिसी जिस की मआश