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नज़्म
है दश्त अब भी दश्त मगर ख़ून-ए-पा से 'फ़ैज़'
सैराब चंद ख़ार-ए-मुग़ीलाँ हुए तो हैं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
अग़्यार की तालीमात पे तो सर धुनना कार-ए-तिफ़्लाँ है
आवारा-मिज़ाजी के सदक़े आवारा-मिज़ाजी आसाँ है
अर्श मलसियानी
नज़्म
नर्म-रफ़्तारी हो वक़्त-ए-सैर-ए-गुलज़ार-ए-तरब
राह-ए-पुर-ख़ार-ए-अमल में गर्म-रफ़्तारी भी हो
अर्श मलसियानी
नज़्म
हर एक की निगाह में बस ख़ार हो गए
बे-सोंचे-समझे मुस्तहिक़-ए-दार हो गए
मिर्ज़ा अल्ताफ़ हुसैन आलिम लखनवी
नज़्म
मुब्तला पेच में हैं ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की तरह
दर पे लटके हैं बशर ख़ार-ए-मुग़ीलाँ की तरह
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
अच्छे और बुरे की सोहबत अपना रंग दिखाती है
खोटे और खरे की तुम को हो पहचान ज़रूरी है
अताउर्रहमान तारिक़
नज़्म
मिली गड्डे से रानाई ओ ज़ेबाई विरासत में
ख़र-ए-दज्जाल से मिलती है सूरत में मलाहत में