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नज़्म
छुपाऊँ क्यों न दिल में ख़ातम-ए-गौहर निगार उस की
यही ले दे के मेरे पास है इक यादगार उस की
नय्यर वास्ती
नज़्म
छुपाऊँ क्यूँ न दिल में ख़ातिम-ए-गौहर-निगार उस की
यही ले दे के मेरे पास है इक यादगार उस की
अख़्तर शीरानी
नज़्म
कुछ ख़बर ऐ हिन्द वालो है कि तुम हो बे-ख़बर
कर रहा है ज़ुल्म ज़ालिम क़ौम के हर फ़र्द पर
वफ़ा बराही
नज़्म
उरूस-ए-शब की ज़ुल्फ़ें थीं अभी ना-आश्ना ख़म से
सितारे आसमाँ के बे-ख़बर थे लज़्ज़त-ए-रम से
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आँखों में काट दिया करते हैं रात
तब किसी लम्हे में वो ज़ात-ए-मुनज़्ज़ह कि जो है ख़ातमा-ए-जुमला-सिफ़ात
वहीद अख़्तर
नज़्म
ज़बानी ख़ादिम-ए-मुल्क-ओ-वतन बनना तो है आसाँ
अगर मख़दूम बनना है तो ख़िदमत की ज़रूरत है