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नज़्म
अपने ही लिक्खे हुए चंद ख़तों की ख़ातिर
मुझ से ख़ाइफ़ ही नहीं ख़ुद से भी बेज़ार हो तुम
प्रेम वारबर्टनी
नज़्म
साइमा इसमा
नज़्म
कहाँ तक ऐ सितमगर चर्ख़ तदबीरें ग़ुलामी की
कि अब बार-ए-गराँ है दिल को ज़ंजीरें ग़ुलामी की
ज़ाहिदा खातून ज़ाहिदा
नज़्म
कोई मुख़्लिस मुझे तुझ सा न मिला तेरे बाद
याद आती है बहुत तेरी वफ़ा तेरे बाद
ज़ाहिदा ख़ातून शरवानिया
नज़्म
कि तुम अपने बाप की पैदाइश से भी बहुत पहले गिरवी रख दिए गए थे
मैं उस दिन से ले कर आज तक बही-खातों के
सलीम फ़िगार
नज़्म
क्यों यास हो न मुझ को बहबूद-ए-हिंदियाँ से
सुनती हूँ गोखले भी रुख़्सत हुए जहाँ से