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नज़्म
हुदूद-ए-इस्तवा क़ुतबैन से यूँ हो गए मुदग़म
कि है अब रुबअ मस्कों जैसे घर की चार-दीवारी
अहमक़ फफूँदवी
नज़्म
इसी यक़ीं से जो इक ख़त्त-ए-मुसतक़ीम-ए-हयात
ज़मीं पे खींचना चाहें तो हम हैं सौदाई
शमीम फ़ारूक़ बांस पारी
नज़्म
निगाह-ए-क़हर की मुश्ताक़ हैं दिल की तमन्नाएँ
ख़त-ए-चीन-ए-जबीं ही को ख़त-ए-क़िस्मत समझते हैं
आनंद नारायण मुल्ला
नज़्म
वो टकराने लगी आवाज़ नीले आसमानों से
वो ख़त्त-ए-रहगुज़र पर जल उठीं शमएँ तरानों से
मंज़ूर हुसैन शोर
नज़्म
मोड़ ओझल हुआ नज़रों से तो फिर राह वही लोग वही
सिर्फ़ वो चेहरा वो आँखें वो ख़त-ओ-ख़ाल न थे
वहीद अख़्तर
नज़्म
मुद्दत से मिरी उन की नहीं ख़त्त-ओ-किताबत
हाँ भूले से चल जाते हैं कुछ तार वग़ैरा