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नज़्म
ये क्या मुमकिन नहीं तू आ के ख़ुद अब इस का दरमाँ कर
फ़ज़ा-ए-दहर में कुछ बरहमी महसूस होती है
कँवल एम ए
नज़्म
ख़ौफ़-ए-बे-हुरमती-ओ-फ़िक्र-ए-ज़ियाँ है तो उठो
पास-ए-नामूस-ए-निगारान-ए-जहाँ है तो उठो
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
बिर्ज लाल रअना
नज़्म
अगर ख़ौफ़-ए-ख़ुदा दिल में है फिर क्यूँ मौत का डर हो
कृष्ण आएँ तो अब भी दें यही पैग़ाम हिन्दू को