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नज़्म
मैं कि मिरी ग़ज़ल में है आतिश-ए-रफ़्ता का सुराग़
मेरी तमाम सरगुज़िश्त खोए हुओं की जुस्तुजू!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
बे-तकल्लुफ़ ख़ंदा-ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैं
फिर उसी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैं
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ये लम्हा जिस के सेहर में खोए हुए हैं हम
कितनी मसर्रतों का सुरूर इस के ग़म में है
हिमायत अली शाएर
नज़्म
जो सदियों के बाद मिली है वो आज़ादी खोए न
दीन धरम के नाम पे कोई बीज फूट का बोए न