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नज़्म
फ़लक से ताज़ा फलों के ख़ोशे चुरा के भरती थीं पहलुओं में
सफ़ेद पानी के सौ कुएँ यूँ भरे हुए थे
अली अकबर नातिक़
नज़्म
चुने मैं ने मौजों से मोती जवाहिर से ज्योति बहारों से राग
लिए मैं ने ख़ोशों से ख़ुशबू के तोशे
यूसुफ़ ज़फ़र
नज़्म
है अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद
कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
रंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौत
मोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ले गए तसलीस के फ़रज़ंद मीरास-ए-ख़लील
ख़िश्त-ए-बुनियाद-ए-कलीसा बन गई ख़ाक-ए-हिजाज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
दरीं हसरत सरा उमरीस्त अफ़्सून-ए-जरस दारम
ज़ फ़ैज़-ए-दिल तपीदन-हा ख़रोश-ए-बे-नफ़स दारम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़रोश-ए-उम्र के इत्माम तक इक बार उठाना है
अनासिर मुंतशिर हो जाने नब्ज़ें डूब जाने तक