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नज़्म
एक पाँव पे खड़े सारे सुतूँ थक से गए हैं
ख़ुर्दा दाँतों की तरह हिलती हैं हर ताक़ में ईंटें
गुलज़ार
नज़्म
फिर भी ऐ बम्बई तू मिरा शहर है
तेरे बाग़ात में मेरी यादों के कितने ही रम-ख़ूर्दा आहू
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
रंजीदा पशेमाँ ज़ख़्म-ख़ूरदा-साअतों बीते दिनों को प्यार से छू कर
दिलासा दूँ थपक कर लोरियाँ दूँ
अज़रा नक़वी
नज़्म
लिपट गए हैं पाँव से लहू में जज़्ब हो गए
मैं नक़्श-पा-ए-उम्र हूँ फ़रेब-ख़ुर्दा-ए-ख़ुशी