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नज़्म
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबी
उफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
थी नज़र हैराँ कि ये दरिया है या तस्वीर-ए-आब
जैसे गहवारे में सो जाता है तिफ़्ल-ए-शीर-ख़्वार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वही ढलती हुई शब और वही बाद-ए-सबा के दोष पर
ख़्वाजा के दीवानों की आवाज़ों की सरमस्ती
इशरत आफ़रीं
नज़्म
कि नागाह आ कर कहा एक ख़्वाजा-सरा ने:
मैं भेजा गया हूँ जनाब-ए-वज़ारत-ए-पनह को बुलाने
नून मीम राशिद
नज़्म
शाइ'र-ओ-सन्नाअ' हो फ़िक्र-ओ-ख़लिश से बे-नियाज़
ख़्वाजा-ओ-मज़दूर में बाक़ी न हो कुछ इम्तियाज़
सीमाब अकबराबादी
नज़्म
आज भी जिस्म के अम्बार हैं बाज़ारों में
ख़्वाजा-ए-शहर है यूसुफ़ के ख़रीदारों में
मख़दूम मुहिउद्दीन
नज़्म
और बस्ती नहीं ये हिन्द है सुन खोल के कान
बच के चलते हैं यहाँ ख़्वाजा ख़िज़र होली में
ज़रीफ़ देहल्वी
नज़्म
आकाश के नीले मंडल पर जो तारों की गुल-कारी है
सज उस की क्या मन-लेवा है धज कैसी प्यारी प्यारी है