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नज़्म
है अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद
कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
कलीद-ए-किश्त-ज़ार-ए-ख़्वाब भी गुम हो गई आख़िर
कहाँ अब जादा-ए-ख़ुर्रम में सर-सब्ज़ाना जाना है
जौन एलिया
नज़्म
रंग हो या ख़िश्त ओ संग चंग हो या हर्फ़ ओ सौत
मोजज़ा-ए-फ़न की है ख़ून-ए-जिगर से नुमूद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तुख़्म जिस का तू हमारी किश्त-ए-जाँ में बो गई
शिरकत-ए-ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गई
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तेरे फ़िरदौस-ए-तख़य्युल से है क़ुदरत की बहार
तेरी किश्त-ए-फ़िक्र से उगते हैं आलम सब्ज़ा-वार
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
बादा है नीम-रस अभी शौक़ है ना-रसा अभी
रहने दो ख़ुम के सर पे तुम ख़िश्त-ए-कलीसिया अभी
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
अभी तो जड़ से किश्त-ओ-ख़ूँ के नज़्म उखड़ने वाले हैं
अभी किसान-ओ-कामगार राज होने वाला है
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
अब संग-ओ-ख़िश्त ओ ख़ाक ओ ख़ज़फ़ सर-बुलंद हैं
ताज-ए-वतन का लाल-ए-दरख़्शाँ चला गया