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नज़्म
धनक गीत बन के समाअ'त को छूने लगी हो
शफ़क़ नर्म कोमल सुरों में कोई प्यार की बात कहने चली हो
परवीन शाकिर
नज़्म
बचपन इन पापों से हट कर अपनी उम्र गुज़ारे
तन कोमल मन सुंदर हैं बच्चे बड़ों से बेहतर हैं
साहिर लुधियानवी
नज़्म
देख री तेरे सोग में कैसा हाल किया हम ने अपना
दुख के कंकर पत्थर चुनते कोमल हाथ हैं पथराए