aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "kool"
दुनिया में पादशह है सो है वो भी आदमीऔर मुफ़्लिस-ओ-गदा है सो है वो भी आदमीज़रदार-ए-बे-नवा है सो है वो भी आदमीनेमत जो खा रहा है सो है वो भी आदमीटुकड़े चबा रहा है सो है वो भी आदमीअब्दाल, क़ुतुब ओ ग़ौस वली-आदमी हुएमुंकिर भी आदमी हुए और कुफ़्र के भरेक्या क्या करिश्मे कश्फ़-ओ-करामात के लिएहत्ता कि अपने ज़ोहद-ओ-रियाज़त के ज़ोर सेख़ालिक़ से जा मिला है सो है वो भी आदमीफ़िरऔन ने किया था जो दावा ख़ुदाई काशद्दाद भी बहिश्त बना कर हुआ ख़ुदानमरूद भी ख़ुदा ही कहाता था बरमलाये बात है समझने की आगे कहूँ मैं क्यायाँ तक जो हो चुका है सो है वो भी आदमीकुल आदमी का हुस्न ओ क़ुबह में है याँ ज़ुहूरशैताँ भी आदमी है जो करता है मक्र-ओ-ज़ोरऔर हादी रहनुमा है सो है वो भी आदमीमस्जिद भी आदमी ने बनाई है याँ मियाँबनते हैं आदमी ही इमाम और ख़ुत्बा-ख़्वाँपढ़ते हैं आदमी ही क़ुरआन और नमाज़ियाँऔर आदमी ही उन की चुराते हैं जूतियाँजो उन को ताड़ता है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी पे जान को वारे है आदमीऔर आदमी पे तेग़ को मारे है आदमीपगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमीचिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमीऔर सुन के दौड़ता है सो है वो भी आदमीचलता है आदमी ही मुसाफ़िर हो ले के मालऔर आदमी ही मारे है फाँसी गले में डालयाँ आदमी ही सैद है और आदमी ही जालसच्चा भी आदमी ही निकलता है मेरे लालऔर झूट का भरा है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी ही शादी है और आदमी बियाहक़ाज़ी वकील आदमी और आदमी गवाहताशे बजाते आदमी चलते हैं ख़्वाह-मख़ाहदौड़े हैं आदमी ही तो मशअ'ल जला के राहऔर ब्याहने चढ़ा है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी नक़ीब हो बोले है बार बारऔर आदमी ही प्यादे हैं और आदमी सवारहुक़्क़ा सुराही जूतियाँ दौड़ें बग़ल में मारकाँधे पे रख के पालकी हैं दौड़ते कहारऔर उस में जो पड़ा है सो है वो भी आदमीबैठे हैं आदमी ही दुकानें लगा लगाऔर आदमी ही फिरते हैं रख सर पे ख़ूनचाकहता है कोई लो कोई कहता है ला रे लाकिस किस तरह की बेचें हैं चीज़ें बना बनाऔर मोल ले रहा है सो है वो आदमीतबले मजीरे दाएरे सारंगियाँ बजागाते हैं आदमी ही हर इक तरह जा-ब-जारंडी भी आदमी ही नचाते हैं गत लगाऔर आदमी ही नाचे हैं और देख फिर मज़ाजो नाच देखता है सो है वो भी आदमीयाँ आदमी ही लाल-ओ-जवाहर में बे-बहाऔर आदमी ही ख़ाक से बद-तर है हो गयाकाला भी आदमी है कि उल्टा है जूँ तवागोरा भी आदमी है कि टुकड़ा है चाँद-साबद-शक्ल बद-नुमा है सो है वो भी आदमीइक आदमी हैं जिन के ये कुछ ज़र्क़-बर्क़ हैंरूपे के जिन के पाँव हैं सोने के फ़र्क़ हैंझमके तमाम ग़र्ब से ले ता-ब-शर्क़ हैंकम-ख़्वाब ताश शाल दो-शालों में ग़र्क़ हैंऔर चीथडों लगा है सो है वो भी आदमीहैराँ हूँ यारो देखो तो क्या ये स्वाँग हैऔर आदमी ही चोर है और आपी थांग हैहै छीना झपटी और बाँग ताँग हैदेखा तो आदमी ही यहाँ मिस्ल-ए-रांग हैफ़ौलाद से गढ़ा है सो है वो भी आदमीमरने में आदमी ही कफ़न करते हैं तयारनहला-धुला उठाते हैं काँधे पे कर सवारकलमा भी पढ़ते जाते हैं रोते हैं ज़ार-ज़ारसब आदमी ही करते हैं मुर्दे के कारोबारऔर वो जो मर गया है सो है वो भी आदमीअशराफ़ और कमीने से ले शाह-ता-वज़ीरये आदमी ही करते हैं सब कार-ए-दिल-पज़ीरयाँ आदमी मुरीद है और आदमी ही पीरअच्छा भी आदमी ही कहाता है ऐ 'नज़ीर'और सब में जो बुरा है सो है वो भी आदमी
साक़ी की हर निगाह पे बल खा के पी गयालहरों से खेलता हुआ लहरा के पी गयाबे-कैफ़ियों के कैफ़ से घबरा के पी गयातौबा को तोड़-ताड़ के थर्रा के पी गयाज़ाहिद! ये तेरी शोख़ी-ए-रिन्दाना देखनारहमत को बातों बातों में बहला के पी गयासर-मस्ती-ए-अज़ल मुझे जब याद आ गईदुनिया-ए-ए'तिबार को ठुकरा के पी गयाआज़ुर्दगी-ए-ख़ातिर-ए-साक़ी को देख करमुझ को ये शर्म आई कि शर्मा के पी गयाऐ रहमत-ए-तमाम मिरी हर ख़ता मुआफ़मैं इंतिहा-ए-शौक़ में घबरा के पी गयापीता बग़ैर इज़्न ये कब थी मिरी मजालदर-पर्दा चश्म-ए-यार की शह पा के पी गयाउस जान-ए-मय-कदा की क़सम बारहा 'जिगर'कुल आलम-ए-बसीत पे मैं छा के पी गया
जहाँ-ज़ादइंतिज़ार आज भी मुझे है क्यूँ वही मगरजो नौ बरस के दौर-ए-ना-सज़ा में था?अब इंतिज़ार आँसुओं के दजला कान गुमरही की रात काशब-ए-गुनाह की लज़्ज़तों का इतना ज़िक्र कर चुकावो ख़ुद गुनाह बन गईं!हलब की कारवाँ-सारा के हौज़ का, न मौत कान अपनी इस शिकस्त-खुर्दा ज़ात काइक इंतिज़ार-ए-बे-अमाँ का तार है बंधा हुआ!कभी जो चंद सानिए ज़मान-ए-बे-ज़मान में आ के रुक गएतो वक़्त का ये बार मेरे सर से भी उतर गयातमाम रफ़्ता ओ गुज़िश्ता सूरतों, तमाम हादसोंके सुस्त क़ाफ़िलेमिरे दरूँ में जाग उठेमेरे दरूँ में इक जहान-ए-बाज़-याफ़्ता की रेल-पेल जाग उठीबहिश्त जैसे जाग उठे ख़ुदा के ला-शुऊर में!मैं जाग उठा ग़ुनूदगी की रेत पर पड़ा हुआग़ुनूदगी की रेत पर पड़े हुए वो कूज़े जोमिरे वजूद से बरूँतमाम रेज़ा रेज़ा हो के रह गए थेमेरे अपने-आप से फ़िराक़ मेंवो फिर से एक कुल बने (किसी नवा-ए-साज़-गार की तरह)वो फिर से एक रक़्स-ए-बे-ज़मान बनेवो रूयत-ए-अज़ल बने!
वो चाय की प्याली पे यारों के जलसेवो सर्दी की रातें वो ज़ुल्फ़ों के क़िस्सेकभी तज़्किरे हुस्न-ए-शो'ला-रुख़ाँ केमोहब्बत हुई थी किसी को किसी सेहर इक दिल वहाँ था नज़र का निशानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाबहुत अपना अंदाज़ था ला-उबालीकभी थे जलाली कभी थे जमालीकभी बात में बात यूँही निकालीसर-ए-राह कोई क़यामत उठा लीकिसी को लड़ाना किसी को बचानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाकभी सच्ची बातों को झूटा बतायाकभी झूटी बातों को सच कर दिखायाकभी राज़-ए-दिल कह के उस को छुपायाकभी दोस्तों में यूँही कुछ उड़ायाबता कर छुपाना छुपा कर बतानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाकभी बज़्म-ए-अहबाब में शोला-अफ़्शाँकभी यूनियन में थे शमशीर-ए-बुर्रांकभी बज़्म-ए-वाइ'ज़ में थे पा-ब-जौलाँबदलते थे हर रोज़ तक़दीर-ए-दौराँजहाँ जैसी डफ़ली वहाँ वैसा गानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाज़माना था वो एक हैवानियत कावो दौर-ए-मलामत था शैतानियत काहमें दर्द था एक इंसानियत काउठाए अलम हम थे हक़्क़ानियत काबढ़े जा रहे थे मगर बाग़ियानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानामुक़ाबिल में आए जसारत थी किस कोकोई रोक दे बढ़ के हिम्मत थी किस कोपुकारे कोई हम को ताक़त थी किस कोकि हर बुल-हवस को थे हम ताज़ियानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाख़यालात-ए-पुर-शौक़ का सिलसिला थाबदल दें ज़माने को वो हौसला थाहर इक दिल में पैदा नया वलवला थाहर इक गाम अहबाब का क़ाफ़िला थाइधर दावा करना उधर कर दिखानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानावो शह-राह-ए-मैरिस के पुर-पेच चक्करवो शमशाद बिल्डिंग पे इक शोर-ए-महशरवो मुबहम सी बातें वो पोशीदा नश्तरवो बे-फ़िक्र दुनिया वो लफ़्ज़ों के दफ़्तरकि जिन का सिरा था न कोई ठिकानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाकिसी को हुई थी किसी से मोहब्बतकोई कर रहा था किसी की शिकायतग़रज़ रोज़ ढाती थी ताज़ा क़यामतकिसी की शबाहत किसी की मलामतकिसी की तसल्ली किसी का सतानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाकोई ग़म-ज़दा था कोई हँस रहा थाकोई हुस्न-ए-नाहीद पर मर मिटा थाकोई चश्म-ए-नर्गिस का बीमार सा थाकोई बस यूँही ताकता झाँकता थाकभी चोट खाना कभी मुस्कुरानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानावो हर जनवरी में नुमाइश के चर्चेवो पुर-शौक़ आँखें वो हैरान जल्वेवो चक्कर पे चक्कर थे बारा-दरी केवो हसरत कि सौ बार मिल कर भी मिलतेहज़ारों बहानों का वो इक बहानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानावो रुख़ आफ़्ताबी पे अबरू हिलालीवो तिमसाल-ए-सीमीं वो हुस्न-मिसालीशगूफ़ों में खेली गुलाबों में पालीवो ख़ुद इक अदा थी अदा भी निरालीनिगाहें बचा कर निगाहें मिला करबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानावो हर-चंद मुझ को नहीं जानती थीमगर मेरी नज़रों को पहचानती थीअगरचे मिरे दिल में वो बस गई थीमगर बात बस दिल की दिल में रही थीमगर आज अहबाब से क्या छुपानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानावो इक शाम बरसात की दिन ढला थाअभी रात आई न थी झुटपुटा थावो बाद-ए-बहारी से इक गुल खिला थाधड़कते हुए दिल से इक दिल मिला थानज़र सुन रही थी नज़र का फ़सानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाजवानी अदाओं में बल खा रही थीकहानी निगाहों में लहरा रही थीमोहब्बत मोहब्बत को समझा रही थीवो चश्म-ए-तमन्ना झुकी जा रही थीक़यामत से पहले क़यामत वो ढानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाहमें बीती बातें जो याद आ रही थींवो मख़्मूर नज़रें जो शर्मा रही थींबहुत अक़्ल-ए-सादा को बहका रही थींबड़ी बे-नियाज़ी से फ़रमा रही थींउन्हें याद रखना हमें भूल जानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाअब वो उमंगें न दिल में मुरादेंअब रह गईं चंद माज़ी की यादेंये जी चाहता है उन्हें भी भला देंग़म-ए-ज़िंदगी को कहाँ तक दुआ देंहक़ीक़त भी अब बन गई है फ़सानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानाअलीगढ़ है बढ़ कर हमें कुल जहाँ सेहमें इश्क़ है अपनी उर्दू ज़बाँ सेहमें प्यार है अपने नाम-ओ-निशाँ सेयहाँ आ गए हम न जाने कहाँ सेक़सम दे के हम को कसी का बुलानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़मानामोहब्बत से यकसर है अंजान दुनियाये वीरान बस्ती परेशान दुनियाकमाल-ए-ख़िरद से ये हैरान दुनियाख़ुद अपने किए पर पशेमान दुनियाकहाँ ले के आया हमें आब-ओ-दानाबहुत याद आता है गुज़रा ज़माना
मिरी ज़िंदगी में बस इक किताब है इक चराग़ हैएक ख़्वाब है और तुम होये किताब ओ ख़्वाब के दरमियान जो मंज़िलें हैं मैं चाहता थातुम्हारे साथ बसर करूँयही कुल असासा-ए-ज़िंदगी है इसी को ज़ाद-ए-सफ़र करूँकिसी और सम्त नज़र करूँ तो मिरी दुआ में असर न होमिरे दिल के जादा-ए-ख़ुश-ख़बर पे ब-जुज़ तुम्हारे कभी किसी का गुज़र न होमगर इस तरह कि तुम्हें भी उस की ख़बर न हो
कुछ ख़्वाब हैं परवर्दा-ए-अनवार मगर उन की सहर गुमजिस आग से उठता है मोहब्बत का ख़मीर उस के शरर गुमहै कुल की ख़बर उन को मगर जुज़ की ख़बर गुमये ख़्वाब हैं वो जिन के लिए मर्तबा-ए-दीदा-ए-तर हेचदिल हेच है सर इतने बराबर हैं कि सर हेचअर्ज़-ए-हुनर हेच!
जहाँ में दानिश ओ बीनिश की है किस दर्जा अर्ज़ानीकोई शय छुप नहीं सकती कि ये आलम है नूरानीकोई देखे तो है बारीक फ़ितरत का हिजाब इतनानुमायाँ हैं फ़रिश्तों के तबस्सुम-हा-ए-पिन्हानीये दुनिया दावत-ए-दीदार है फ़रज़ंद-ए-आदम कोकि हर मस्तूर को बख़्शा गया है ज़ौक़-ए-उर्यानीयही फ़रज़ंद-ए-आदम है कि जिस के अश्क-ए-ख़ूनीं सेकिया है हज़रत-ए-यज़्दाँ ने दरियाओं को तूफ़ानीफ़लक को क्या ख़बर ये ख़ाक-दाँ किस का नशेमन हैग़रज़ अंजुम से है किस के शबिस्ताँ की निगहबानीअगर मक़्सूद-ए-कुल मैं हूँ तो मुझ से मावरा क्या हैमिरे हंगामा-हा-ए-नौ-ब-नौ की इंतिहा क्या है
शमीम-ए-ज़ुल्फ़ से उस की महक जाती थी कुल वादीनिगाह-ए-मस्त से उस की बहक जाती थी कुल वादीहवाएँ पर-फ़िशाँ रूह-ए-मय-ओ-मय-ख़ाना रहती थीयही वादी है वो हमदम जहाँ 'रेहाना' रहती थी
ये कौन मुस्कुराहटों का कारवाँ लिए हुएशबाब-ए-शेर-ओ-रंग-ओ-नूर का धुआँ लिए हुएधुआँ कि बर्क़-ए-हुस्न का महकता शोला है कोईचटीली ज़िंदगी की शादमानियाँ लिए हुएलबों से पंखुड़ी गुलाब की हयात माँगे हैकँवल सी आँख सौ निगाह-ए-मेहरबाँ लिए हुएक़दम क़दम पे दे उठी है लौ ज़मीन-ए-रह-गुज़रअदा अदा में बे-शुमार बिजलियाँ लिए हुएनिकलते बैठते दिनों की आहटें निगाह मेंरसीले होंट फ़स्ल-ए-गुल की दास्ताँ लिए हुएख़ुतूत-ए-रुख में जल्वा-गर वफ़ा के नक़्श सर-ब-सरदिल-ए-ग़नी में कुल हिसाब-ए-दोस्ताँ लिए हुएवो मुस्कुराती आँखें जिन में रक़्स करती है बहारशफ़क़ की गुल की बिजलियों की शोख़ियाँ लिए हुएअदा-ए-हुस्न बर्क़-पाश शोला-ज़न नज़ारा-सोज़फ़ज़ा-ए-हुस्न ऊदी ऊदी बिजलियाँ लिए हुएजगाने वाले नग़मा-ए-सहर लबों पे मौजज़ननिगाहें नींद लाने वाली लोरियाँ लिए हुएवो नर्गिस-ए-सियाह-ए-नीम-बाज़, मय-कदा-ब-दोशहज़ार मस्त रातों की जवानियाँ लिए हुएतग़ाफ़ुल-ओ-ख़ुमार और बे-ख़ुदी की ओट मेंनिगाहें इक जहाँ की होशयारियाँ लिए हुएहरी-भरी रगों में वो चहकता बोलता लहूवो सोचता हुआ बदन ख़ुद इक जहाँ लिए हुएज़-फ़र्क़ ता-क़दम तमाम चेहरा जिस्म-ए-नाज़नींलतीफ़ जगमगाहटों का कारवाँ लिए हुएतबस्सुमश तकल्लुमे तकल्लुमश तरन्नुमेनफ़स नफ़स में थरथराता साज़-ए-जाँ लिए हुएजबीन-ए-नूर जिस पे पड़ रही है नर्म छूट सीख़ुद अपनी जगमगाहटों की कहकशाँ लिए हुए''सितारा-बार ओ मह-चकाँ ओ ख़ुर-फ़िशाँ'' जमाल-ए-यारजहान-ए-नूर कारवाँ-ब-कारवाँ लिए हुएवो ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म शमीम-ए-मस्त से धुआँ धुआँवो रुख़ चमन चमन बहार-ए-जावेदाँ लिए हुएब-मस्ती-ए-जमाल-ए-काएनात, ख़्वाब-ए-काएनातब-गर्दिश-ए-निगाह दौर-ए-आसमाँ लिए हुएये कौन आ गया मिरे क़रीब उज़्व उज़्व मेंजवानियाँ, जवानियों की आँधियाँ लिए हुएये कौन आँख पड़ रही है मुझ पर इतने प्यार सेवो भूली सी वो याद सी कहानियाँ लिए हुएये किस की महकी महकी साँसें ताज़ा कर गईं दिमाग़शबों के राज़ नूर-ए-मह की नर्मियाँ लिए हुएये किन निगाहों ने मिरे गले में बाहें डाल दींजहान भर के दुख से दर्द से अमाँ लिए हुएनिगाह-ए-यार दे गई मुझे सुकून-ए-बे-कराँवो बे-कही वफ़ाओं की गवाहियाँ लिए हुएमुझे जगा रहा है मौत की ग़ुनूदगी से कौननिगाहों में सुहाग-रात का समाँ लिए हुएमिरी फ़सुर्दा और बुझी हुई जबीं को छू लियाये किस निगाह की किरन ने साज़-ए-जाँ लिए हुएसुते से चेहरे पर हयात रसमसाती मुस्कुरातीन जाने कब के आँसुओं की दास्ताँ लिए हुएतबस्सुम-ए-सहर है अस्पताल की उदास शामये कौन आ गया नशात-ए-बे-कराँ लिए हुएतिरे न आने तक अगरचे मेहरबाँ था इक जहाँमैं रो के रह गया हूँ सौ ग़म-ए-निहाँ लिए हुएज़मीन मुस्कुरा उठी ये शाम जगमगा उठीबहार लहलहा उठी शमीम-ए-जाँ लिए हुएफ़ज़ा-ए-अस्पताल है कि रंग-ओ-बू की करवटेंतिरे जमाल-ए-लाला-गूँ की दास्ताँ लिए हुए'फ़िराक़' आज पिछली रात क्यूँ न मर रहूँ कि अबहयात ऐसी शामें होगी फिर कहाँ लिए हुए(2)मगर नहीं कुछ और मस्लहत थी उस के आने मेंजमाल-ओ-दीद-ए-यार थे नया जहाँ लिए हुएइसी नए जहाँ में आदमी बनेंगे आदमीजबीं पे शाहकार-ए-दहर का निशाँ लिए हुएइसी नए जहाँ में आदमी बनेंगे देवतातहारतों का फ़र्क़-ए-पाक पर निशाँ लिए हुएख़ुदाई आदमी की होगी इस नए जहान परसितारों के हैं दिल ये पेश-गोईयाँ लिए हुएसुलगते दिल शरर-फ़िशाँ ओ शोला-बार बर्क़-पाशगुज़रते दिन हयात-ए-नौ की सुर्ख़ियाँ लिए हुएतमाम क़ौल और क़सम निगाह-ए-नाज़-ए-यार थीतुलू-ए-ज़िंदगी-ए-नौ की दास्ताँ लिए हुएनया जनम हुआ मिरा कि ज़िंदगी नई मिलीजियूँगा शाम-ए-दीद की निशानियाँ लिए हुएन देखा आँख उठा के अहद-ए-नौ के पर्दा-दारों नेगुज़र गया ज़माना याद-ए-रफ़्तगाँ लिए हुएहम इन्क़िलाबियों ने ये जहाँ बचा लिया मगरअभी है इक जहाँ वो बद-गुमानियाँ लिए हुए
न ताबनाकी-ए-रुख़ है न काकुलों का हुजूमहै ज़र्रा ज़र्रा परेशाँ कली कली मग़्मूमहै कुल जहाँ मुतअफ़्फ़िन हवाएँ सब मस्मूमगुज़र भी जा कि तिरा इंतिज़ार कब से है
ख़ुदा अलीगढ़ के मदरसे को तमाम अमराज़ से शिफ़ा देभरे हुए हैं रईस-ज़ादे अमीर-ज़ादे शरीफ़-ज़ादेलतीफ़ ओ ख़ुश-वज़'अ चुस्त ओ चालाक ओ साफ़ ओ पाकीज़ा शाद-ओ-ख़ुर्रमतबीअतों में है इन की जौदत दिलों में इन के हैं नेक इरादेकमाल-ए-मेहनत से पढ़ रहे हैं कमाल-ए-ग़ैरत से पढ़ रहे हैंसवार मशरिक़ राह में हैं तो मग़रिबी राह में पियादेहर इक है इन में का बे-शक ऐसा कि आप उसे चाहते हैं जैसादिखावे महफ़िल में क़द्द-ए-र'अना जो आप आएँ तो सर झुका देफ़क़ीर माँगे तो साफ़ कह दें कि तू है मज़बूत जा कमा खाक़ुबूल फ़रमाएँ आप दावत तो अपना सरमाया कुल खिला देबुतों से इन को नहीं लगावट मिसों की लेते नहीं वो आहटतमाम क़ुव्वत है सर्फ़-ए-ख्वांदन नज़र के भोले हैं दिल के सादेनज़र भी आए जो ज़ुल्फ़-ए-पेचाँ तो समझें ये कोई पॉलीसी हैइलेक्ट्रिक लाइट उस को समझें जो बर्क़-वश कोई कूदेनिकलते हैं कर के ग़ोल-बंदी ब-नाम-ए-तहज़ीब ओ दर्द-मंदीये कह के लेते हैं सब से चंदे जो तुम हमें दो तुम्हें ख़ुदा देउन्हें इसी बात पर यक़ीं है कि बस यही अस्ल कार-ए-दीं हैइसी से होगा फ़रोग़-ए-क़ौमी इसी से चमकेंगे बाप दादेमकान-ए-कॉलेज के सब मकीं हैं अभी उन्हें तजरबे नहीं हैंख़बर नहीं है कि आगे चल कर है कैसी मंज़िल हैं कैसे जादेदिलों में इन के हैं नूर-ए-ईमाँ क़वी नहीं है मगर निगहबाँहवा-ए-मंतिक़ अदा-ए-तिफ़ली ये शम्अ ऐसा न हो बुझा देफ़रेब दे कर निकाले मतलब सिखाए तहक़ीर-ए-दीन-ओ-मज़हबमिटा दे आख़िर को दीन-ओ-मज़हब नुमूद-ए-ज़ाती को गो बढ़ा देयही बस 'अकबर' की इल्तिजा है जनाब बारी में ये दुआ हैउलूम ओ हिकमत का दर्स इन को प्रोफ़ेसर दें समझ ख़ुदा दे
इक यही सोज़-ए-निहाँ कुल मिरा सरमाया हैदोस्तो मैं किसे ये सोज़-ए-निहाँ नज़्र करूँकोई क़ातिल सर-ए-मक़्तल नज़र आता ही नहींकिस को दिल नज़्र करूँ और किसे जाँ नज़्र करूँतुम भी महबूब मिरे, तुम भी हो दिलदार मिरेआश्ना मुझ से मगर तुम भी नहीं, तुम भी नहींख़त्म है तुम पे मसीहा-नफ़सी, चारागरीमहरम-ए-दर्द-ए-जिगर तुम भी नहीं तुम भी नहींअपनी लाश आप उठाना कोई आसान नहींदस्त-ओ-बाज़ू मिरे नाकारा हुए जाते हैंजिन से हर दौर में चमकी है तुम्हारी दहलीज़आज सज्दे वही आवारा हुए जाते हैंदर्द-ए-मंज़िल थी, मगर ऐसी भी कुछ दूर न थीले के फिरती रही रस्ते ही में वहशत मुझ कोएक ज़ख़्म ऐसा न खाया कि बहार आ जातीदार तक ले के गया शौक़-ए-शहादत मुझ कोराह में टूट गए पाँव तो मालूम हुआजुज़ मिरे और मिरा राह-नुमा कोई नहींएक के ब'अद ख़ुदा एक चला आता थाकह दिया अक़्ल ने तंग आ के ख़ुदा कोई नहीं
नेक बच्चे दिल से करते हैं अदब उस्ताद काबाप की उल्फ़त से बेहतर है ग़ज़ब उस्ताद काआम लोगों की जहालत दूर करने के लिएहक़-तआ'ला ने बनाया है सबब उस्ताद काउस की बरकत से जहाँ में फैलती हैं नेकियाँक्यों न फिर उस्ताद से राज़ी हो रब उस्ताद काकुछ न कुछ उम्दा सबक़ देती है उस की ज़िंदगीख़ुल्क़ से ख़ाली नहीं है कोई ढब उस्ताद काजिस घड़ी नादान बच्चों को सिखाता है वो इल्मचूम लेते हैं फ़रिश्ते आ के लब उस्ताद काबस उसे पढ़ने-पढ़ाने से हमेशा काम हैकितना अच्छा मश्ग़ला है रोज़-ओ-शब उस्ताद काख़्वाह सारी उम्र उस के पाँव धो धो कर पिएआदमी से हक़ अदा होता है कब उस्ताद काइम्तिहाँ में हल न हो जिस दम कोई मुश्किल सवालख़ुद पसंदों को पता चलता है तब उस्ताद काशुक्र के जज़्बात से गर्दन झुका लेता हूँ मैंयाद आता है मुझे एहसान जब उस्ताद काकल ज़माने की निगाहों में वो इज़्ज़त पाएगामर्तबा पहचान जाएगा जो अब उस्ताद काउस की आलमगीर हैसिय्यत है शाहों की तरहकुल अजम उस्ताद का है कुल अरब उस्ताद काचल रहे हैं आज दुनिया में हज़ारों महकमेसच अगर पूछो तो है ये 'फ़ैज़' सब उस्ताद का
ये अँधेरी रात ये सारी फ़ज़ा सोई हुईपत्ती पत्ती मंज़र-ए-ख़ामोश में खोई हुईमौजज़न है बहर-ए-ज़ुल्मत तीरगी का जोश हैशाम ही से आज क़िंदील-ए-फ़लक ख़ामोश हैचंद तारे हैं भी तो बे-नूर पथराए हुएजैसे बासी हार में हों फूल कुम्हलाए हुएखप गया है यूँ घटा में चाँदनी का साफ़ रंगजिस तरह मायूसियों में दब के रह जाए उमंगउमडी है काली घटा दुनिया डुबोने के लिएया चली है बाल खोले राँड रोने के लिएजितनी है गुंजान बस्ती उतनी ही वीरान हैहर गली ख़ामोश है हर रास्ता सुनसान हैइक मकाँ से भी मकीं की कुछ ख़बर मिलती नहींचिलमनें उठती नहीं ज़ंजीर-ए-दर हिलती नहींसो रहे हैं मस्त-ओ-बे-ख़ुद घर के कुल पीर-ओ-जवाँहो गई हैं बंद हुस्न-ओ-इश्क़ में सरगोशियाँहाँ मगर इक सम्त इक गोशे में कोई नौहागरले रही है करवटों पर करवटें दिल थाम करदिल सँभलता ही नहिं है सीना-ए-सद-चाक मेंफूल सा चेहरा अटा है बेवगी की ख़ाक मेंउड़ चली है रंग-ए-रुख़ बन कर हयात-ए-मुस्तआरहो रहा है क़ल्ब-ए-मुर्दा में जवानी का फ़िशारहसरतें दम तोड़ती हैं यास की आग़ोश मेंसैकड़ों शिकवे मचलते हैं लब-ए-ख़ामोश मेंउम्र आमादा नहीं मुर्दा-परस्ती के लिएबार है ये ज़िंदा मय्यत दोश-ए-हस्ती के लिएचाहती है लाख क़ाबू दिल पे पाती ही नहींहाए-रे ज़ालिम जवानी बस में आती ही नहींथरथर्रा कर गिरती है जब सूने बिस्तर पर नज़रले के इक करवट पटक देती है वो तकिया पे सरजब खनक उठती हैं सोती लड़कियों की चूड़ियाँआह बन कर उठने लगता है कलेजा से धुआँहो गई बेवा की ख़ातिर नींद भी जैसे हराममुख़्तसर सा अहद-ए-वसलत दे गया सोज़-ए-दवामदोपहर की छाँव दौर-ए-शादमानी हो गयाप्यास भी बुझने न पाई ख़त्म पानी हो गयाले रही है करवटों पर करवटें बा-इज़तिरारआग में पारा है या बिस्तर पे जिस्म-ए-बे-क़रारपड़ गई इक आह कर के रो के उठ बैठी कभीउँगलियों में ले के ज़ुल्फ़-ए-ख़म-ब-ख़म एेंठी कभीआ के होंटों पर कभी मायूस आहें थम गईंऔर कभी सूनी कलाई पर निगाहें जम गईंइतनी दुनिया में कहीं अपनी जगह पाती नहींयास इस हद की कि शौहर की भी याद आती नहींआ रहे हैं याद पैहम सास ननदों के सुलूकफट रहा है ग़म से सीना उठ रही है दिल में हूकअपनी माँ बहनों का भी आँखें चुराना याद हैऐसी दुनिया में किसी का छोड़ जाना याद हैबाग़बाँ तो क़ब्र में है कौन अब देखे बहारख़ुद उसी को तीर उस के करने वाले हैं शिकारजब नज़र आता नहीं देता कोई बेकस का साथज़हर की शीशी की जानिब ख़ुद-ब-ख़ुद बढ़ता है हाथदिल तड़प कर कह रहा है जल्द इस दुनिया को छोड़चूड़ियाँ तोड़ीं तो फिर ज़ंजीर-ए-हस्ती को भी तोड़दम अगर निकला तो खोई ज़िंदगी मिल जाएगीये नहिं तो ख़ैर तन्हा क़ब्र ही मिल जाएगीवाँ तुझे ज़िल्लत की नज़रों से न देखेगा कोईचाहे हँसना चाहे रोना फिर न रोकेगा कोईवाँ सब अहल-ए-दर्द हैं सब साहब-ए-इंसाफ़ हैंरहबर आगे जा चुका राहें भी तेरी साफ़ हैंदिल इन्हीं बातों में उलझा था कि दम घबरा गयाहाथ ले कर ज़हर की शीशी लबों तक आ गयातिलमिलाती आँख झपकाती झिझकती हाँफतीपी गई कुल ज़हर आख़िर थरथराती काँपतीमौत ने झटका दिया कुल उज़्व ढीले हो गएसाँस उखड़ी, नब्ज़ डूबी, होंट नीले हो गएआँख झपकी अश्क टपका हिचकी आई खो गईमौत की आग़ोश में इक आह भर कर सो गईऔर कर इक आह सुलगे हिन्द की रस्मों का दामऐ जवाना-मर्ग बेवा तुझ पे 'कैफ़ी' का सलाम
ऐ मजाज़ ऐ तराना-बार मजाज़ज़िंदा पैग़म्बर-ए-बहार मजाज़ऐ बरू-ए-समन-विशाँ गुल-पोशऐ ब कू-ए-मुग़ाँ तमाम ख़रोशऐ परस्तार-ए-मह-रुख़ान-ए-जहाँऐ कमाँ-दार-ए-शाइरान-ए-जवाँतुझ से ताबाँ जबीन-ए-मुस्तक़बिलऐ मिरे सीना-ए-उमीद के दिलऐ मजाज़ ऐ मुबस्सिर-ए-ख़द-ओ-ख़ालऐ शुऊर-ए-जमाल ओ शम-ए-ख़यालऐ सुरय्या-फ़रेब ओ ज़ोहरा-नवाज़शाइर-ए-मस्त ओ रिंद-ए-शाहिद-बाज़नाक़िद-ए-इश्वा-ए-शबाब है तूसुब्ह-ए-फ़र्दा का आफ़्ताब है तूतुझ को आया हूँ आज समझानेहैफ़ है तू अगर बुरा मानेख़ुद को ग़र्क़-ए-शराब-ए-नाब न करदेख अपने को यूँ ख़राब न करशाइरी को तिरी ज़रूरत हैदौर-ए-फ़र्दा की तू अमानत हैसिर्फ़ तेरी भलाई को ऐ जाँबन के आया हूँ नासेह-ए-नादाँएक ठहराव इक तकान है तूदेख किस दर्जा धान-पान है तूनंग है महज़ उस्तुख़्वाँ होनासख़्त इहानत है ना-तवाँ होनाउस्तुख़्वानी बदन दुख़ानी पोस्तएक संगीन जुर्म है ऐ दोस्तशर्म की बात है वजूद-ए-सक़ीमना-तवानी है इक गुनाह-ए-अज़ीमजिस्म और इल्म तुर्फ़ा ताक़त हैयही इंसान की नबुव्वत हैजो ज़ईफ़-ओ-अलील होता हैइश्क़ में भी ज़लील होता हैहर हुनर को जो एक दौलत हैइल्म और जिस्म की ज़रूरत हैकसरत-ए-बादा रंग लाती हैआदमी को लहू रुलाती हैख़ुश-दिलों को रुला के हँसती हैशम-ए-अख़्तर बुझा के हँसती हैऔर जब आफ़त जिगर पे लाती हैरिंद को मौलवी बनाती हैमय से होता है मक़्सद-ए-दिल फ़ौतमय है बुनियाद-ए-मौलविय्यत-ओ-मौतकान में सुन ये बात है नश्तरमौलविय्यत है मौत से बद-तरइस से होता है कार-ए-उम्र तमामइस से होता है अक़्ल को सरसामइस में इंसाँ की जान जाती हैइस में शाइर की आन जाती हैये ज़मीन आसमान क्या शय हैआन जाए तो जान क्या शय हैगौहर-ए-शाह-वार चुन प्यारेमुझ से इक गुर की बात सुन प्यारेग़म तो बनता है चार दिन में नशातशादमानी से रह बहुत मोहतातग़म के मारे तो जी रहे हैं हज़ारनहीं बचते हैं ऐश के बीमारआन में दिल के पार होती हैपंखुड़ी में वो धार होती हैजू-ए-इशरत में ग़म के धारे हैंयख़-ओ-शबनम में भी शरारे हैंहाँ सँभल कर लताफ़तों को बरतटूट जाए कहीं न कोई परतदेख कर शीशा-ए-नशात उठाये वरक़ है वरक़ है सोने काकाग़ज़-ए-बाद ये नगीना हैबल्कि ऐ दोस्त आबगीना हैसाग़र-ए-शबनम-ए-ख़ुश-आब है येआबगीना नहीं हबाब है येरोक ले साँस जो क़रीब आएठेस उस को कहीं न लग जाएतेग़-ए-मस्ती को एहतियात से छूवर्ना टपकेगा उँगलियों से लहूमस्तियों में है ताब-ए-जल्वा-ए-माहऔर सियह मस्तियाँ ख़ुदा की पनाहख़ूब है एक हद पे क़ाएम नशाहल्का फुल्का सुबुक मुलाएम नशाहाँ अदब से उठा अदब से जामताकि आब-ए-हलाल हो न हरामजाम पर जाम जो चढ़ाते हैंऊँट की तरह बिलबिलाते हैंज़िंदगी की हवस में मरते हैंमय को रुस्वा-ए-दहर करते हैंयाद है जब 'जिगर' चढ़ाते थेक्या अलिफ़ हो के हिन-हिनाते थेमेरी गर्दन में भर के चंद आहेंपाँव से डालते थे वो बाँहेंअक़्ल की मौत इल्म की पस्तीअल-अमाँ ला'नत-ए-सियह मस्तीउफ़ घटा-टोप नश्शे का तूफ़ानभूत इफ़रीत देव जिन शैतानलात घूँसा छड़ी छुरी चाक़ूलिब-लिबाहट लुआब कफ़ बदबूतंज़ आवाज़ा बरहमी इफ़्सादता'न तशनीअ' मज़हका ईरादशोर हू-हक़ अबे-तबे है हैऔखियाँ गालियाँ धमाके क़यमस-मसाहट ग़शी तपिश चक्करसोज़ सैलाब सनसनी सरसरचल-चख़े चीख़ चुनाँ-चुनीं चिंघाड़चख़-चख़े चाऊँ चाऊँ चील-चिलहाड़लप्पा-डुक्की लताम लाम लड़ाईहौल हैजान हाँक हाथा-पाईखलबली कावँ कावँ खट-मंडलहौंक हंगामा हमहमा हलचलउलझन आवारगी उधम ऐंठनभौंक भौं भौं भिऩन भिऩन भन-भनधौल-धप्पा धकड़-पकड़ धुत्कारतहलका तू तड़ाक़ तुफ़ तकरारबू भभक भय बिकस बरर भौंचालदबदबे दंदनाहटें धम्मालगाह नर्मी ओ लुत्फ़ ओ मेहर ओ सलामगाह तल्ख़ी ओ तुरशी ओ दुश्नामअक़्ल की मौत इल्म की पस्तीअल-अमाँ ला'नत-ए-सियह मस्तीसिर्फ़ नश्शे की भीगने दे मसेंइन को बनने न दे कभी मूँछेंअल-अमाँ ख़ौफ़नाक काला नशाओह रीश-ओ-बुरूत वाला नशाअज़दर-ए-मर्ग ओ देव-ए-ख़ूँ-ख़्वारीअल-अमाँ नश्शा-ए-''जटाधारी''नश्शे का झुट-पुटा है नूर-ए-हयातझुटपुटे को बना न काली रातनश्शे की तेज़ रौशनी भी ग़लतचौदहवीं की सी चाँदनी भी ग़लतज़ेहन-ए-इंसाँ को बख़्शता है जमालनश्शा हो जब ये क़द्र-ए-नूर-ए-हिलालग़ुर्फ़ा-ए-अक़्ल भेड़ तो अक्सरपर उसे कच-कचा के बंद न कररात को लुत्फ़-ए-जाम है प्यारेदिन का पीना हराम है प्यारेदिन है इफ़रीत-ए-आज़ की खनकाररात पाज़ेब नाज़ुकी झंकारदिन है ख़ाशाक ख़ाक धूल धुआँरात आईना अंजुमन अफ़्शाँदिन मुसल्लह दवाँ कमर बस्तारात ताक़-ओ-रवाक़-ओ-गुल-दस्तादिन है फ़ौलाद-ए-संग तेग़-ए-अलमरात कम-ख़्वाब पंखुड़ी शबनमदिन है शेवन दुहाइयाँ दुखड़ेरात मस्त अँखड़ियाँ जवाँ मुखड़ेदिन कड़ी धूप की बद-आहंगीरात पिछले पहर की सारंगीदिन बहादुर का बान बीर की रथरात चंपाकली अँगूठी नथदिन है तूफ़ान-ए-जुम्बिश-ओ-रफ़्ताररात मीज़ान-ए-काकुल-ओ-रुख़्सारआफ़्ताब-ओ-शराब हैं बैरीबोतलें दिन को हैं पछल पैरीकर न पामाल हुर्मत-ए-औक़ातरात को दिन बना न दिन को रातपी मगर सिर्फ़ शाम के हंगामऔर वो भी ब-क़द्र-ए-यक-दो जामवही इंसाँ है ख़ुर्रम-ओ-ख़ुरसंदजो है मिक़दार ओ वक़्त का पाबंदमेरे पीने ही पर न जा मिरी जाँमुझ से जीना भी सीख हैं क़ुर्बांउस के पीने में रंग आता हैजिस को जीने का ढंग आता हैये नसाएह बहुत हैं बेश-बहाजल्द सो जल्द जाग जल्द नहाबाग़ में जा तुलूअ' से पहलेता निगार-ए-सहर से दिल बहलेसर्व-ओ-शमशाद को गले से लगाहर चमन-ज़ाद को गले से लगामुँह अँधेरे फ़ज़ा-ए-गुलशन देखसाहिल ओ सब्ज़ा-ज़ार ओ सौसन देखगाह आवारा अब्र-पारे देखइन की रफ़्तार में सितारे देखजैसे कोहरे में ताब-रु-ए-निकूजैसे जंगल में रात को जुगनूगुल का मुँह चूम इक तरन्नुम सेनहर को गुदगुदा तबस्सुम सेजिस्म को कर अरक़ से नम-आलूदताकि शबनम पढ़े लहक के दरूदफेंक संजीदगी का सर से बारनाच उछल दंदना छलांगें मारदेख आब-ए-रवाँ का आईनादौड़ साहिल पे तान कर सीनामस्त चिड़ियों का चहचहाना सुनमौज-ए-नौ-मश्क़ का तराना सुनबोस्ताँ में सबा का चलना देखसब्ज़ा ओ सर्व का मचलना देखशबनम-आलूद कर सुख़न का लिबासचख धुँदलके में बू-ए-गुल की मिठासशाइरी को खिला हवा-ए-सहरइस का नफ़क़ा है तेरी गर्दन पररक़्स की लहर में हो गुम लब-ए-नहरयूँ अदा कर उरूस-ए-शेर का महरजज़्ब कर बोस्ताँ के नक़्श-ओ-निगारज़ेहन में खोल मिस्र का बाज़ारनर्म झोंकों का आब-ए-हैवाँ पीबू-ए-गुल रंग-ए-शबनमिस्ताँ पीगुन-गुना कर नज़र उठा कर पीसुब्ह का शीर दग़दग़ा कर पीताकि मुजरे को आएँ कुल बर्कातदौलत जिस्म ओ इल्म ओ अक़्ल ओ हयातये न ता'ना न ये उलहना हैएक नुक्ता बस और कहना हैग़ैबत-ए-नूर हो कि कसरत-ए-नूरज़ुल्मत-ए-ताम हो कि शो'ला-ए-तूरएक सा है वबाल दोनों कातीरगी है मआ'ल दोनों कादर्खुर-ए-साहब-ए-मआ'ल नहींहर वो शय जिस में ए'तिदाल नहींशादमानी से पी नहीं सकताजिस को हौका हो जी नहीं सकताऐ पिसर ऐ बरादर ऐ हमराज़बन न इस तरह दूर की आवाज़कोई बीमार तन नहीं सकताख़ादिम-ए-ख़ल्क़ बन नहीं सकताख़िदमत-ए-ख़ल्क़ फ़र्ज़ है तुझ परदौर-ए-माज़ी का क़र्ज़ है तुझ परअस्र-ए-हाज़िर के शाइर-ए-ख़ुद्दारक़र्ज़-दारी की मौत से होश्यारज़ेहन-ए-इंसानियत उभार के जाज़िंदगानी का क़र्ज़ उतार के जातुझ पे हिन्दोस्तान नाज़ करेउम्र तेरी ख़ुदा दराज़ करे
यारब रहे सलामत उर्दू ज़बाँ हमारीहर लफ़्ज़ पर है जिस के क़ुर्बान जाँ हमारीमिस्री सी तोलता है शक्कर सी घोलता हैजो कोई बोलता है मीठी ज़बाँ हमारीहिन्दू हो पारसी हो ईसाई हो कि मुस्लिमहर एक की ज़बाँ है उर्दू ज़बाँ हमारीदुनिया की बोलियों से मतलब नहीं हमें कुछउर्दू है दिल हमारा उर्दू है जाँ हमारीदुनिया की कुल ज़बानें बूढ़ी सी हो चुकी हैंलेकिन अभी जवाँ है उर्दू ज़बाँ हमारीअपनी ज़बान से है इज़्ज़त जहाँ में अपनीगर हो ज़बाँ न अपनी इज़्ज़त कहाँ हमारीउर्दू की गोद में हम पल कर बड़े हुए हैंसौ जाँ से हम को प्यारी उर्दू ज़बाँ हमारी'आज़ाद'-ओ-'मीर'-ओ-'ग़ालिब' आएँगे याद बरसोंकरती है नाज़ जिन पर उर्दू ज़बाँ हमारीअफ़्रीक़ा हो अरब हो अमरीका हो कि यूरोपपहुँची कहाँ नहीं है उर्दू ज़बाँ हमारीमिट जाएँगे हम मिटने न देंगे इस कोहै जान-ओ-दिल से प्यारी हम को ज़बाँ हमारी
शिद्दत-ए-दर्द-ओ-अलम से जब भी घबराता हूँ मैंतेरे नग़्मों की घनी छाँव में आ जाता हूँ मैंज़िंदगी का आइना ये है तिरे फ़न का कमालहै उधर हद्द-ए-फ़लक तक तेरी पर्वाज़-ए-ख़यालचल गया सारे दिलों पर तेरा सेहर-ए-सामरीजावेदाँ ऐ अमृता-प्रीतम है तेरी शाइ'रीशिद्दत-ए-एहसास हो तो ख़ुद सँवर जाता है फ़नरौशनी होती है कुल दुनिया में जब जलता है मनसर-फिरे कुछ अहल-ए-फ़न मारे हुए तक़दीर केयूँही बे-समझी में हैं दुश्मन तिरी तहरीर केदुश्मनों के वार से डरती न घबराती है तूलोग पत्थर फेंकते हैं फूल बरसाती है तूतेरे फ़न के मो'तरिफ़ होंगे वो वक़्त आने को हैफूल तेरे फ़न का हर गुलशन को महकाने को है
चर्चा हर एक आन है उर्दू ज़बान कागिरवीदा कुल जहान है उर्दू ज़बान का
वो बे-ख़बर हैकि शातिर-ए-वक़्त की नज़र मेंकोई इकाईशजर हजर हो कि ज़ी-नफ़्स होनिज़ाम-ए-कुल से अलग नहीं हैवो ये नहीं जानती कि हस्ती के कार-ख़ाने मेंउस का होना न होना बे-नाम हादिसा हैऔर उस के हिस्से का कुल असासावो चंद लम्हे वो चंद साँसें हैंजिन में वो ख़्वाब देखती हैसलीक़ा-ए-ज़ात से चमन को सँवारने काबहार-ए-जाँ को निखारने का2बजा कि ना-पाएदार है ये वजूद मेरामैं ग़ैर-फ़ानी हयात के सिलसिले मेंइक बीच की कड़ी हूँरहीन-ए-गर्दिश भी मरकज़-ए-काएनात भी हूँजो मैं ने देखा है वो मिरे ख़ूँ में रच गया हैजो मैं ने सोचा है मुझ में ज़िंदा हैऔर जो कुछ सुना है मुझ में समा गया हैहवा की सूरत हर एक एहसासमेरी साँसों में जी रहा हैहर एक मंज़र मिरे तसव्वुर में बस गया हैमैं ज़ात-ए-महदूद अपनी पहनाइयों मेंइक काएनात भी हूँमिरी रगों में वो जोशिश-ए-जावेदाँ रवाँ हैजो शाख़ में फूल की नुमू हैजो बहर में मौज की तड़प हैपर-ए-कबूतर में ताब-ए-परवाज़ हैसितारों में रौशनी हैमैं अपने होने के सब हवालों में रूनुमा हूँमैं जा-ब-जा सूरत-ए-सबा हूँग़ज़ाल-ए-ख़ुश-चश्म की कलियों में खेलता हूँहुमकते बच्चे की मुस्कुराहट हूँपीर-ए-शब-ख़ेज़ की दुआ हूँमैं मेहर में माहताब में हूँये कैसी चाहत है जिस से मैंएक मुस्तक़िल इज़्तिराब में हूँवो कौन सी मंज़िल तलब थीकि राँझा राँझा पुकारती हीरआप ही राँझा हो गई थी
भलाई सब की हो जिस से वो काम उस का हैजहाँ भी जाओ वहीं एहतिराम उस का हैउठाए सर कोई क्या सर उठा नहीं सकतामुक़ाबले के लिए आगे आ नहीं सकताकिसी से उस को मोहब्बत किसी से उल्फ़त हैकिसी को उस की है उस को किसी की हसरत हैवफ़ा-ओ-लुत्फ़ तरह्हुम की ख़ास आदत हैग़रज़ करम है मुदारात है इनायत हैकिसी को देख ही सकता नहीं है मुश्किल मेंये बात क्यूँ है कि रखता है दर्द वो दिल मेंवो रश्क-ए-शम-ए-हिदायात है अंजुमन के लिएवो मिस्ल-ए-रूह-ए-रवाँ उंसुर-ए-बदन के लिएवो एक साग़र-ए-नौ महफ़िल-ए-कुहन के लिएवो ख़ास मसलह-ए-कुल शैख़-ओ-बरहमन के लिएलगन उसे है कि सब मालिक-ए-वतन हो जाएँक़फ़स से छूट के ज़ीनत-दह-ए-चमन हो जाएँजफ़ा-शिआ'र से होता है बर-सर-ए-पैकारन पास तोप न गोला न क़ब्ज़े में तलवारज़माना ताबा-ए-इरशाद हुक्म पर तय्यारवो पाक शक्ल से पैदा हैं जोश के आसारकिसी ख़याल से चर्ख़े के बल पे लड़ता हैखड़ी है फ़ौज ये तन्हा मगर अकड़ता हैतरह तरह के सितम दिल पर अपने सहता हैहज़ार कोई कहे कुछ ख़मोश रहता हैकहाँ शरीक हैं आँखों से ख़ून बहता हैसुनो सुनो कि ये इक कहने वाला कहता हैजो आबरू तुम्हें रखनी हो जोश में आओरहो न बे-खु़द-ओ-बे-होश होश में आओउसी को घेरे अमीर-ओ-ग़रीब रहते हैंनदीम-ओ-मूनिस-ओ-यार-ओ-हबीब रहते हैंअदब के साथ अदब से अदीब रहते हैंनसीब-वर हैं वो बड़े ख़ुश-नसीब रहते हैंकोई बताए तो यूँ देख-भाल किस की हैजो उस से बात करे ये मजाल किस की हैरिफ़ाह-ए-आम से रग़बत है और मतलब हैअनोखी बात निराली रविश नया ढब हैयही ख़याल था पहले यही ख़याल अब हैफ़क़त है दीन यही बस यही तो मज़हब हैअगर बजा है तो 'बिस्मिल' की अर्ज़ भी सुन लोचमन है सामने दो-चार फूल तुम चुन लो
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