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नज़्म
ये जा कर कोई बज़्म-ए-ख़ूबाँ में कह दो
कि अब दर-ख़ोर-ए-बज़्म-ए-ख़ूबाँ नहीं मैं
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
तुझे सब ढूँडते हैं इस तरह अंधे हैं सब जैसे
इसी कोरे वरक़ पर कुछ इबारत भी उन्हें दे दे
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
जो बद-रंग है हाल की तरह और कोरे लट्ठे की बू से भरी है
हमारे लिए सिर्फ़ रोटी की जिद्द-ओ-जोहद
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
कोरे अल्फ़ाज़ की सौग़ात कहाँ से लाऊँ
ख़ुश्क आँखों के कटोरों से मैं बरसात कहाँ से लाऊँ
खुर्शीद अकबर
नज़्म
पर उस से मेरी शायरी में दर्द कम तो नहीं हो जाता
कोरे काग़ज़ पर भी कुछ शब्द बसते हैं
अमित ब्रिज शॉ
नज़्म
जब हसीनों की तसावीर किताबों में मिलें
कोरे काग़ज़ ही सवालों के जवाबों में मिलें
ग़ौस ख़ाह मख़ाह हैदराबादी
नज़्म
मुनीर अहमद फ़िरदौस
नज़्म
दिलों तक जो पहुँचे मैं वो साज़ हूँ
घुटन क़ैद बंदिश के एहसास से कोरे जज़्बात से दूर हूँ मुतमइन
तबस्सुम फ़तमा
नज़्म
अगर मैं ज़मीं के सियह तंग पाताल में गिर भी जाऊँ तो क्या है
तुझे तो ज़मीं कोरे काग़ज़ की सूरत मिले
वज़ीर आग़ा
नज़्म
कुछ लफ़्ज़ रक़्स करने लगते हैं
लेकिन जब कभी मैं इन लफ़्ज़ों को काग़ज़ के कोरे बदन पर टाँकना चाहती हूँ